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08 जनवरी, 2013

08-01-2013

तमाम हालातों के बीच आकाशवाणी चित्तौड़ के मार्फ़त 'बस्सी काष्ठ कला' पर एक रेडियो रूपक बनाने में जुटा हूँ।रूपक हमने प्रवीण कुमार जोशी से लिखवाया है जिसने अपनी सेमी-गोरमेंट नौकरी यानिकि पैराटीचरी इसी बस्सी इलाके में तीन साल तक की है। हमारे गुरु और निहायती सज्जन अधिकारी  चिमनाराम जी के निर्देशन में बनने वाला ये रूपक संभवतया जयपुर-अजमेर केंद्र से पूरे राज्य में इसी माह प्रसारित होगा। ज़मीन से जुड़े कलाकारों के लिए कुछ सार्थक काम करने का अलग आनंद और संतुष्टि है जो किसी मानदेय से थोड़ा ज्यादा मायने रखती है। इसी बहाने हम अपनी ही माटी की कला और समय के साथ लड़ते उन कारीगरों से मुखातिब हो रहे हैं। 

इस मशीनी युग में कितनी कलाएं यूंही ही दम तोड़ रही हैं। रूद्र वीणा बजाने वाले कितने कम बचे हैं।कुड़ीयट्टम को किस तरीके से फिर से प्रकाश में लाया गया है ये बात यूनेस्को से पूछो। डी जे आदि की शक्लों वाले भीड़-भड़क्के के ईजाद होने के बाद लंगा-मांगनियार की गायकी को उनके जजमान ही पूरा मान नहीं दे पा रहे हैं। बेमौत मरती इस कलाओं के उठावने की किसी को चिंता नहीं है। कोई ग्यारहवां और बारहवां नहीं होता इनके हित। लुप्त हो गए वाध्य यंत्रों के हित कोई मासिक और सालाना धूप-बत्ती नहीं लगती। इनके हित कोई श्राद्ध-तर्पण नहीं होता।और तो और इस तकनिकी युग में कई बड़े फनकारों को फेसबुक-ट्विटर करना पड़ता है।मार्केटिंग के मामले में बहुत जगह मारामारी करनी पड़ती है।चित्तौड़ में प्रवास पर मुझे एक बार पंडित रोनू मजुमदार ने कहा कि हम ये फेसबुक-ट्विटर करें कि  बांसुरी बजाते हुए रियाज़/शो करें।
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घर में माँ है जो फर्श पर बैठकर कम्बल से मूँह निकालते हुए ताक रही है अपने बेटे और बेटे की बेटी को। एक पत्नी है जो सिंगल परिवार की आदत के चलते अचानक सास के दो दिन वाले प्रवास से आंशिक रूप से असहज है।घर में एक बेटी है जो तेज़ सर्दी के कारण हुए पांच दिन तक स्कूली अवकाश की घोषणा से बोरा गयी है।एक आकस्मिक उदघोषक है जो अपने बीते दिन की शाम खाए डोसे और नियमित उदघोषक प्रकाश खत्री जी के साथ की चाय में ही खोया हवा है। आठ कांपती हुयी अंगुलियाँ और दो अंगूठे हैं जो कल के ख़रीदे दस्तानों में खुद को महफूज समझ रहे हैं।रातभर ओढ़कर सोये ऊनी टोपे से सिर के बाल किसी राजमार्ग की सड़क की तरह सपाट हो गए हैं।

बकौल प्रकाश खत्री 'घर तो घर जैसा होता है'

घर में एक खूंटी पर चार्जर,कुछ कपड़े,एक कैलेण्डर लटका है। टेबल पर फोन है, उसी से सटा हुआ कम्प्यूटर, पर्स, मोबाईल पड़ा  है। कलाई के वियोग में एक घड़ी खुली हुयी पड़ी है। कुछ चाबियाँ  है जो तालों से दूर रबड़ रही है।सवेरे की मस्ती में अभी बिस्तर अपनी सलवटों से भी बाहर नहीं आ पाए हैं।दिन की योजनाएं तक सर्द दिन की शुरुआत में दुबकी बैठी है। आने के दस मिनट बाद की अपनी 'मौत' पर आज का अखबार रद्दी होने की तरफ खिसक रहा है। एक कौने में बंद पड़े टी वी के 'मौन' को समझने वाला यहाँ कोई नहीं है। एक आलिया है जहां से फाटक खुलने के बाद भगवान् की बहुत सी तस्वीरें झाँक रही है। एक अलमारी से रोजमर्रा के कपड़े  उबक कर बाहर तक आ रहे हैं। कुछ आँखें चश्मे के भीतर से एक चमकदार स्क्रीन पर इबारत पढ़ रही हैं। इस पूरे सीन में चार जोड़ी पाँव भी हैं जो लगातार चल रहे हैं। मोझे में ही ठिठुरन के मारे वे पाँव नि:शब्द सारा दुःख अकेले झेलते हुए हमारे घर को घर बनाए हुए हैं।

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