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07 जनवरी, 2013

7-01-2013

आदतें बदलने की कोशिश करते समय केवल खुद को 'पात्र' समझना चाहिए।बाकी दूजों को बदलने की हिमाक़त कर लेना बड़ी बेवकूफी की तरफ कदम रखना साबित हो जाएगा।कोई उपदेशों से बदल जाएगा महज गलतफहमी ही है शायद।ये बदलाव की हिलोर है उठते हुए ही उठेगी भाई।
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चित्तौड़ वाले को निम्बाहेड़ा वाला,जयपुर वाले को चित्तौड़ वाला और दिल्ली वाले को जयपुर वाला बहुत हद तक अजानकार,अगंभीर और कम अपडेट इंसान अनुभव होता है। मुझे लगता है कि इस विडंबना के लिए हमारी मानसिकता जिम्मेदार है।थोड़ा सा ज़मीन के करीब जाकर नए नज़रिए से देखेंगे तो शायद दुनिया बदले हुए रूप में नज़र आये।
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रातभर सपनों में अपनेपन की बास आती रही उस कोट के मार्फ़त जो मुझे तेज़ सर्दी और मेरी एक तारीफ़ के बाद प्रकाश खत्री जी ने एक दिन के लिए दिया।ये दिलदारी और दिलफेंक अंदाज़ भी क्या खूब रहा।आकार में मुझसे बड़ा था मगर पर्याप्त गरम वो कोट मुझे शायद सालों तक रिश्तों की गरमी परोसता रहेगा।चित्तौड़ की सर्दी से भला कौन बच सका है।हर बार लगा कि अब मरे कि तब मरे।रूम हीटर सब बेकार।जिनके पास हीटर है उनके पास प्लग नहीं और जिनके पास प्लग के खांचे हैं वे हीटर से महरूम है जनाब।
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हमारे स्पिक मैके के एक हरफनमौला खिलाड़ी जे पी भटनागर कल इसी आन्दोलन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में चुने गए। मुझे भी खुशी हुयी इतनी नहीं जितनी उन्हें हुयी होगी। खैर। मैं इस पद को 'सुशोभित' कर चुका हूँ। बहुत घिसाई की है स्पिक मैके में। दिल्ली या फिर मीटिंगों में जाने आने का थ्री ए सी किराया। भोजन,आवास बिलकुल मुफ्त।मगर ये दायित्व काम/मेहनत और विचार/चिंतन माँगता है।तब तारीफों की गूंज के साथ 'नानी' याद आती है।मेहनत तो फिर भी की जा सकती है।'चिंतन' किसी खेत में नहीं उगता है।
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