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06 जनवरी, 2013

06-01-2013

कल हमने डॉ सत्यनारायण व्यास के घर हुयी संगोष्ठी का प्रेस नोट भेजा।

(समकालीन परिदृश्य में देश में जिस तरह के हालात है,कहीं न कहीं हमारी मानसिकता प्रश्नों के घेरे में हैं।पुरुष वर्चस्व वाले इस समाज को अपने ढाँचे के बारे में फिर से चिंतन करना चाहिए।यहाँ हमारी रुढ़िवादी परम्पराओं में सीता ही अग्नि परीक्षा दे यह कहाँ का न्याय है।चारित्रिक पतन के सवाल के घेरे में हम सभी हैं।सभी तरह के वादों से ऊपर उठते हुए हमें मानवतावाद का पक्षधर होना होगा।तभी हमारे इंसान होने का सही फ़र्ज़ हम पूरा कर पायेंगे।कविता,कहानी आदि का शगल और साहित्य जीवन के लिए साधन मात्र है साध्य नहीं।जीवन ही सर्वोपरी है।साहित्य और दर्शन हमें सही मायने में जीना सिखाते हैं।

यह विचार कवि गोष्ठी की शुरुआत में हिन्दी समालोचक और कवि डॉ सत्यनारायण व्यास ने व्यक्त किये। अपनी माटी वेबपत्रिका के चित्तौड़गढ़ समूह से जुड़े साथियों द्वारा तीन जनवरी शाम एक कवि गोष्ठी का आयोजन सैंथी में किया गया।बिना किसी औपचारिकता के इस गोष्ठी में लोककलाविद चन्द्रकान्ता व्यास ने सरस्वती वन्दना के मार्फ़त गुरु शंकराचार्य के द्वारा देवी के आव्हान को शब्द दिए।वहीं संस्कृतिकर्मी माणिक ने अपनी दो कविताओं के ज़रिये हमारे बदलते हुए सामाजिक परिवेश में पीछे छूटते हुए मूल्यों का बखान किया।समय के साथ ख़त्म होते सनातन प्रतिमान के प्रति चिंता जाहिर की।अब कोई आवाज़ नहीं देता पड़ौसी  को , नहीं याद आता दूजा पड़ौसी जैसी शीर्षक वाली रचना के साथ ही आँगन आकाशवाणी का जैसी बिम्ब प्रधान कविता सुनाई।प्राकृतिक बिम्बों के मानवीयकरण के लिहाज से रचना सराही गयी।

आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी,कवि और युवा कहानीकार योगेश कानवा ने तीन कवितायेँ पढ़ी जिनमें इस दौर में आदमी के बहुत नीचे तक जाकर गिरने और मानव मूल्यों को ताक में रखकर जीने की कला जैसे विषय को अपना आधार बनाया।पुलिस व्यवस्था और सेल संस्कृति को भी उन्होंने अपना निशाना बनाया।कोलेज में हिन्दी प्राध्यापक डॉ राजेन्द्र कुमार सिंघवी ने रामायण और महाभारत के अंशों से उदाहरण लेते हुए 
तीन मुक्तक गाकर सुनाये।और कहा कि हमारे हिन्दी साहित्य के इतिहास में अफ़सोस इस बात का है कि गीत,ग़ज़ल की परम्परा को सही मायने में अंकित नहीं किया गया।

अंत में डॉ सत्यनारायण व्यास ने अपनी हाल में खासी चर्चित प्रबंध रचना सीता की अग्नि परीक्षा के शुरुआती पद सुनाये।निराला की राम की शक्ति पूजा के उतरार्ध के रूप में लिखी इस लम्बी कविता के बहाने डॉ व्यास ने हमारे समाज में महिलाओं के प्रति पुरुषों के दोगले चरित्र को उजागर किया है।साथ ही उन्होंने इस संक्रमण के काल में बचे हुए सुख की तरफ इशारा करती एक छन्दमुक्त कविता भी सुनायी।

गोष्ठी के अंत में हिन्दी व्याख्याता डॉ कनक जैन, कोलेज प्राध्यापक डॉ राजेश चौधरी  ने सुनायी गयी कविताओं के बारे में विस्तार से अपने विचार रखकर विमर्श किया। केन्द्रीय साहित्य अकादेमी द्वारा चंद्रकांत देवताले जैसे वरिष्ठ कवि को अकादेमी सम्मान दिए जाने पर खुशी ज़ाहिर की। आयोजन को अतिथि, संचालन, स्वागत और आभार जैसी औपचारिकता से दूर रखा गया।)

''अखबार में साहित्य-संस्कृति की खबरें नहीं छपा करती।''-माणिक (निजी अनुभव से उपजे दुःख के बाद )

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