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05 जनवरी, 2013

05-01-2013

अफसोस टी वी हम सभी को एक सरीखा समझ कर और हर इलाके को मेगा सिटी समझ कर सामग्री परोस रही है।जहां रेटिंग मीटर लगे हैं वहाँ से ऐसे शो को रेटिंग मिल रही है।ज़रा एक बार सर्वे करा लिया जाए देशभर में कि ऐसी नग्नता कौन है जो 'सार्वजनिक' रूप से देखना चाहता है।लानत है ऐसे इंसानों पर जो इस नंगे नाच को सपरिवार देख रहे हैं मगर बोलते कुछ नहीं।
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अल सुबह सपने देखने में बीत रही है।कुछ दिनों से सर्दी ने किसी चिपकू रिश्तेदार की तरह डेरा डाल रखा है।काम की फ़ेहरिश्त देख कर दिमाग चकराने के अलावा कोई चारा नहीं है। किसी दिए हुए विषय पर स्क्रिप्ट उकेरनी है।स्कूल की मरम्मत का हिसाब लगाना है। इसी बीच गृहस्थी का राशन कभी भी हाथ खींच बाज़ार ले चला जाता है।कभी हिंदीसेवी मित्रों  की टोली के बीच लगा मजमा उठने ही नहीं देता।सवेरे का समय बेटी को स्कूल की बस पकड़वाने के सामूहिक प्रयासों में खुट (ख़त्म) जाता है।अचानक पिछे आये दोस्त की तरह ये फेसबुक का इश्क कभी भी थप्पी दे देता है और फिर घंटेभर तक चाय सुड़कता रहता है।दुपहरे बदन तपाने में निकल जाती है।शामें फोन पर बतियाने में।कभी आकाशवाणी मुझे अपनी साप्ताहिक ड्यूटी की याद दिलाने के हित आँख मारती है। तो कभी टी वी पर से हाथ हिलाती हुयी ये मारक और ज्ञानवर्धक बहसें मुझे अपने पास बिठा लेती है। इन सभी झमेलों के बीच से कहीं गाँव में रहते मेरे बाबूजी और माँ का ठण्ड में ठिठुरता बदन याद आ पड़ता है। और मैं विकल हो जाने के अलावा कुछ भी नहीं कर पाता।असल में इसके अलावा मैं कुछ करना भी नहीं चाहता हूँ।
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