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04 जनवरी, 2013

04-01-2013

पहले से तय था।मुझे योगेश जी कानवा को लेकर सत्यनारायण जी के घर जाना था। कानवा जी पास गाड़ी  नहीं थी ऑफिस की गाड़ी हर कहीं तो नहीं ले जाई जा सकती है ना।कल ही मेरी एम् ए  हिन्दी के पहले साल के सारे पेपर ख़त्म हुए थे।फोन से पता लगा व्यास जी ने अपने घर कोई छोटी संगोष्ठी रखी है। गृहस्थी के ज़रूरी काम निबटा मैं वहाँ जाते वक़्त राजेन्द्र सिंघवी जी को ले गया। आज पहली बार उन्होंने भी अपने बचपन में लिखी कविता पढने का मन बनाया।कनक भैया को पूछा पता लगा वे आधे रास्ते पहुँच गए।गज़ब की ठण्ड थी।शहर के लगभग बाहर सैंथी में व्यास जी का घर।लेकिन उनका कहा हम टाल जाए,सम्भव नहीं था।मकसद कविता पढ़ने  से ज्यादा मिलने जुलने का था।

सवा सात सब हाज़िर।व्यास जी व्यास गाडी पर पहले से रजाई ओढ़ बैठे थे।हम भी कुर्सियों में धंस गए।कमरा पर्याप्त गरम था।घर में चन्द्रकान्ता जी (मम्मी जी )ही थे।बस कुह्ह हाय-हेलो के बाद मम्मी जी ने व्यास जी की लिखी सरस्वती वन्दना पढ़ी ।गोष्ठी शुरू।दूजा नंबर मेरा।एक कविता 'शनै-शनै सब गायब' पढ़ी ,बहुत से दाद मिली।दिल खुश हुआ।एक की और फरमाईश हुयी ,' आँगन आकाशवाणी' का पढ़ी।ये दोनों कवितायेँ पहली बार पढ़ी थी। फिर कनक भैया जैसे श्रोता को फलांग कर योगेश जी ने तीन कवितायेँ पढ़ी।फिर राजेश जी को फलांग कर राजेन्द्र बाबू ने तीन मुक्तक लय में सुनाये।गज़ब की पकड़ है गले में।मौक़ा मिले तो राजेन्द्र बाबू को 
छोड़ना मत।अंत में व्यास जी ने अपनी 'सीता की अग्नि परीक्षा' सुनायी।

फिर आया नास्ता - तिल्ली की पपड़ी,गुजराती ट्रेंड का हांडवा,पकौड़ी,चाय,सर्दी के लड्डू और भी बहुत कुछ।भरपेट  आनंद।इस प्रकार कल शाम सात बजे से एक घंटे तक विशुद्ध रूप से कवितायेँ सुनी और सुनाई।हज़ारों के सामने मंच पर पढ़ने की लालसा मुझे कभी रास नहीं आयी।कल हम केवल दस थे।उसमें से कवि चार।बाकी विमर्श हुआ।आपस की बात हुयी।जलपान हुआ।एक इत्मीनान था।फोटो-फाटी की जल्दी नहीं थी।कोई औपचारिकता हमें धकेल नहीं रही थी।हम खुले थे।बिना जल्दबाजी के दो-दो कवितायेँ।बिना संचालन की संगोष्ठी।अतिथि-फतिथि के झंझट से मुक्ति।

कितना सुकून था उन दो घंटों में।ये वक़्त चित्तौड़ के डॉ सत्यनारायण व्यास के घर पर एक सहज आयोजन के रूप में बीता।डॉ कनक जैन,डॉ राजेश चौधरी,डॉ राजेन्द्र कुमार सिंघवी,मैं,योगेश कानवा,चन्द्रकान्ता व्यास,जे के पुर्बिया थे बस।इस तरह की संगत इंसान को जीवन का अंदाज सिखाती है।खैर।औपचारिक रिपोर्ट भी देने की कोशिश करूंगा।जो शायद कहीं अखबार में छप जाए।

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