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11 अप्रैल, 2013

11-04-2013

'कवि' तीन तरह के होते हैं एक व्यवस्था विरोधी जो बहुत कम बचे हैं।दूजे 'व्यवस्था सापेक्ष' हैं जिनकी संख्या बढ़ने के पुख्ता इंतज़ाम हैं।तीजे 'कविता विरोधी' हैं जो 'अपढ़' तो हैं ही और आगे जाकर दिशा भ्रमित हो लगातार लिख रहे हैं क्योंकि उन्हें किसी ने कह दिया है कि 'आप अच्छे कवि हैं'।हाय कविता ! तेरा दुःख अब नहीं देखा जाता।मित्रो, इन पहली तरह के कवियों की संख्या में इजाफा करने का कोई ज़रूरी उपाय बताएं।
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कइयों के बारे में सोचकर रोना आता है कि मुझे उन सभी को फिलहाल इसलिए बांसुरी वादन सुनाना है कि वे सिर्फ इस बात का फरक कर सके कि शहनाई, पूंगी, बांसुरी और अलगोजा सब अलग-अलग  हैं और इन सभी की आवाजें भी अलग-अलग तरह से आती है।वे बेचारे निर्दोष हैं उन्हें हमारी संस्कृति के मायने कुछ 'अलग' ही सिखाये गए हैं।गोया अगर 'नव संवत' पर मैं आपको हेप्पी न्यू ईयर ना कहूं तो लोग मुझे हिंदुत्व विरोधी समझ बैठेंगे।
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कल शहर में एक पहुंचे हुए संत आये। 'भव्य स्वागत' शब्द में 'भव्य' का सही रूप मैंने कल देखा।हर दस फीट पर दो स्वागत दरवाज़े।हर तरह के 'हाथों' में नाजुक फूल।हर तरह की 'ज़बानों' पर संत महात्माओं की जय-जयकार।कैमरामेन,विडियोग्राफर, प्रेस विज्ञप्ति जारीकर्ता सब ताँ-ज्याँ(मुस्तैद)।संत के आने मे देरी तक के अन्तराल में फोटो खिंचाई की रस्मों-रिवाज़ में पूरा आनंद लेने की फुर्ती। अफसोस महात्मा के चरण छूने में बेचारे वे लोग पीछे रह गए जो वाकई घर से चरण छूने ही निकले थे।उस भाड़ा-भीड़ में लोगों की कितनी और किस किस तरीके से जेबें कटी कल का अखबार बताएगा।
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उन्हें इतना दो समझा दो भाई कि 'आमंत्रण पत्र' की तारीफ़ में कहे दो 'असली शब्द' भी एक सक्रिय स्वयं सेवक को प्रेरित करते हैं।हमारा शुक्रिया कह दो कि हम कूपन बाँटकर कोई ईनामी चक्कर में आपको बुला नहीं रहे हैं।हमारा थेंक्स कह दो कि हमने वहाँ साहित्यिक आयोजन के चारों तरफ खाने-पीने  की स्टॉल्स नहीं लगाईं। वैसे इस बात के लिए भी उन्हें हमारा भला मानना चाहिए कि हमने उन पर किसी ड्रेस कोड में आने की बाध्यता नहीं थोपी। 'बड़े दिल से बुला रहे हैं भाई' ये वाक्य उन्हें कहना भी पड़ेगा क्योंकि लोग अब भी  'भावों' पर संदेह करते हैं और कहे/छपे वाक्यों पर भरोसा कायम है।

उन्हें ये भी कह देना कि कार्ड पूरा पढ़ें वहाँ एक एक शब्द सोचकर समझ कर फलाने-धिंकने से सलाह-मशवरे के बाद चस्पा किया गया है।अरे हाँ एक बात और कि उन्हें आख़िरी निवेदन अर्ज़ किया है कि ये वाला आमंत्रण कार्ड छ: रुपये प्रति के हिसाब से छपा है। सहयोग राशि किसी ने अपनी मासिक सेलेरी में से सखुशी  दी है।अब भी नहीं आओगे तो अगले कार्ड की प्रतीक्षा मत करना।

उन्हें शायद मालुम ही ना हो कि कार्ड पर उनके नाम लिखे जाने के बाद से उनके घर तक पहुँचने के बीच उनके नाम,घर के पते,नाश्ते के मीनू और आयोजन में उनके आने की संभावना पर कितना चिंतन हुआ होगा।चिंतन इस बात पर भी हुआ है कि उस दिन पूर्णिमा के व्रत करने करने वाले कितने रहेंगे? शुगर के कारण फीकी चाय वाले कितने-क होंगे?वगैरह-वगैरह 

काश वे समझ पायें और आयोजन में महज इसलिए चले आये कि 'अगर वे नहीं आयेंगे तो इसका खामियाजा वे व्यक्तिगत स्तर पर ही उठाएंगे।' यानी हमारे किसी एक मित्र के शब्दों में 'लफ्फाजी' से बच जायेंगे।
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ये लाल रंगी गमछा बांधे 
युवा रवि कुमार का इंकलाबी चेहरा है।

ये कविता नहीं हो सकती
किसी की जी हजुरी में 

ये कविता ज़रूर होगी
किसी हुकुमत के खिलाफ

ये बात मेरा दिलो-दिमाग सब कहते हैं ।


(ये विचार रवि कुमार,रावतभाटा का एक फोटो देख कर आये जो 'विकल्प' के किसी राष्ट्रीय सम्मलेन में कविता पाठ का था।)

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