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14 अप्रैल, 2013

14-03-2013

बाबा साहेब की आज जयन्ती है।मुआफ़ करना बाबा साहेब आज कुछ व्यस्तता है मैं आपकी मूर्ति पर मालाएं पहनाने नहीं आ सकूंगा।अरे हाँ माला पहनाते हुए दूजों की तरह फोटो खिंचवा के अखबार में देना तो मेरे लिए बिलकुल भी मुनासिब नहीं होगा।आप जानते हो मुझे ये प्रोपेगेंडा शुरू से ही नहीं रुचता।मेरे बाकी दोस्तों की तरह एक मजमा लगाके,शामियाना सजा के खाली इसी तारीख पर ज्ञान बगारने के बजाय मैं आड़े दिन भी उन्हें आपके बारे में बताना ज्यादा ज़रूरी समझता हूँ बाबा। वैसे भी एक बात कहूं आपको समझने के लिए मुझे चौदह अप्रैल पर डिपेंड होने की ज़रूरत नहीं पड़ती है।संस्कृति और समाज के दूजे कामों में मैं वाकई भूल गया कि चौदह अप्रैल को आपका बर्थ डे पड़ता है।वैसे अब मैं ठीक स्थिति में हूँ।सामाजिक बराबरी के नाम पर अब यहाँ आपके फोलोवर संतोषजनक स्थिति में हैं।मगर एक बात कहें दु:खी मत होता।हमारे कुछ साथी अब भी बुरी लतों में फंसे पड़े हैं।कितनी अजीब बात है की वे दुसरे फ्रंट यानी शोषक जातियों को दुश्मन की निगाह से देखते हैं।आप ही बताएं जो काम परगाम के लोग हमारे गाँव के हित अब तक करते रहे क्या हम भी उन्हीं की तरह बदला लेके वैसे ही कृत्य करें।जहां तक मेरी बुद्धि काम करती है बाबा आपने कभी भी बदला लेना नहीं सिखाया था। ये ठीक रहा कि आपके बनाए संविधान से हमें अब बहुत सयाहता मिलती हैं वरना हम तो कभी के साफ़ कर दिए जाते।अब हमारी जाति के  नाम से उतना भेदभाव नहीं रहा।कुछ 'अपढ़' लोगों का इलाज अब भी करना बाकी है। अपने आप बुद्धि  आ जायेगी।अब आप कहाँ तक गोके लगाएंगे और उन्हें हांकेंगे।कुछ तो समाज पर छोड़ दिजिएगा।

अरे हाँ आजकल हमारे समाज में कुछ लोग आपके नाम पर साल में दो आयोजन करते हैं।कुछ भाषणबाजी, नेतानगरी कर-कुराके अपने सालभर के काम निकलवाने का हुनर सीख गए हैं।बहुत सी मर्तबा विचार आया कि गैर बराबरी के विरुद्ध आपके विचार आज कुछ ज्यादा ज़रूरी लगते हैं।कभी कभी ये भी लगता है कि 'अम्बेडकरछाप' मित्रो को भी अम्बेडकर जी को दुबारा पढ़ना चाहिए।केवल 'जय भीम'  कहने के साथ ही उस 'भीम' के ताप को भी समझना चाहिए। बाबा अभी तो चलता हूँ; एक बस्ती में जाना है कुछ गंवारों ने जात-पात के नाम पर अड़ंगा पैदा कर दिया है सुलझाना है।फिर आता हूँ बाबा मैं किसी दिन आपकी मूर्ति पर माला चढ़ाने जिस दिन कम से कम चौदह अप्रैल तो ना हो।ताकि आप भी आपाधापी में नहीं रहे और मैं भी इत्मीनान से आपसे बात कर सकूं।
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तबला वादक भी उतना ही ज़रूरी है भाई जितना सितार वादक, सारंगी वादक, सरोद वादक, इसराज वादक, संतूर वादक, बांसुरी वादक, शहनाई वादक, मेंडोलिन वादक, वायलिन वादक, वीणा वादक , मोहन वीणा, सात्विक वीणा वादक, रूद्र वीणा  वादक, गिटार वादक या फिर कोई हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन शैली(जो उत्तर भारतीय शैली कही जाती हैं।) का फ़नकार।सभी में तबला बराबर का महत्व रखता है।कभी तबले के बगैर इन सभी ऊपर वर्णित कलाओं को देखिएगा, लूले-लंगड़े नज़र आयेंगे।लम्बे आलाप के बाद कान तबले की थाप के लिए ही तरसते हैं।जुगलबंदी और तिगलबंदी में तबला हमेशा शामिल होता ही है।

अब मेरा सवाल कि इस सच के बावजूद हम तबलची से अपेक्षाकृत कम बात करते हैं।तबला वादक से पत्रकार इंटरव्यू करना कम उचित समझते हैं।स्टे फेसिलिटी में कम दर्जे का रूम एलोट करना हो तो तबले वाला याद आता है।डिनर और लंच का मीनू पूछना हो तो तबले वाले उस्ताद के बजाय किसी सितारिस्ट से पूछा जाता है।ऑटोग्राफ तक केवल मेन आर्टिस्ट से लिए जाने की परम्परा चल निकली है।आमंत्रण पत्रों में संगत के कलाकारों के नाम छप जाए बस उन्हें आदर देने की रस्म वहीं तक रह गयी है।अफ़सोस इन सभी भेदभावों के बीच भी कई उस्ताद  और उनके शागिर्द अब भी तबला वादन सीख रहे हैं। ये उनकी भलमनसाहत है कि वे कुछ नहीं कहते। वे आपको 'पढ़ा-लिखा और बुद्धिजीवी' मानकर मामला आप पर छोड़े हुए हैं। इस दोगले रसिक समाज में दिस पॉइंट इज टू बी नोटेड।

यही माज़रा बरकरार रहा तो कोई बाप अपने बेटों को तबला वादक बनाने के बजाय गायक या फिर सारंगी वादक बनाना पसंद करेगा।हर माँ अपनी बेटी को संगत के वाध्य यन्त्र की तालीम के बजाय कथक, भरतनाट्यम, कथकली, कुचिपुड़ी, मणिपुरी, मोहिनीअट्टम और ओडिसी नृत्य सिखाने का बंदोवस्त करेगी।ज्यादा सक्षम होगी तो केरल का लुप्तप्राय: नृत्य कुड़ीयट्टम सिखाएगी।मगर तबला या फिर मृदंगम नहीं सिखाएगी।संगत के कलाविदों के साथ हमारी तरफ से ये छूत का बरताव उन्हें इस बात पर सोचने को कहेगा कि सह गायकी, मंझिरे, हारमोनियम, एड्क्या, मिराव, पखावज, नटूवंगम की तालीम छोड़ सब कुछ दूजी चीजों की तरफ ध्यान बटाएं गोया ध्रुपद, हवेली संगीत, कर्नाटकी गायन, सूफी गायन।

आज की डायरी कुछ ज्यादा ही गरिष्ठ हो गयी।सॉरी।

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