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15 अप्रैल, 2013

15-04-2013

कभी कभी ऐसा होता कि कोई  अच्छा जानकार घर आता है और दस ज़रूरी किताबों के बारे में हमें सुझाव देता हुआ कुछ पढने-लिखने और फिर आगे बढ़ने की सलाह देता है।तब सारा भ्रम टूट जाता है और मैं खुद को ज़ीरो के आसपास पाता हूँ।शुक्रिया राजेश जी चौधरी आज मेरे घर चाय पर आने के लिए।ये सीख भी तभी सही दिशा में असर करती है जब सीख देता इंसान हमारी अपनी की-सी शक्ल का हो।उसका अंदाज़ सहज हो।वरना भाव खाकर और उलाहने देने वाले तो रोज़ तीने-क मिल ही जाते हैं।

बकौल राजेश चौधरी, कोटा ऑपन और इग्नू के नोट्स से हिन्दी स्नातकोत्तर में अंकों का जुगाड़ सम्भव है।इधर उधर की गाईड पढ़ कर नेट/सेट भी पार किया जा सकेगा। कोई जुगाडू गुरु मिल जाये तो भी इसमें आश्चर्य नहीं है। माणिक ग़र वाकई कॉलेज/वॉलेज में आने का मानस हो तो इंटरव्यू के बारे में जाने से पहले मूल किताबें पार करना बेहद ज़रूरी है।बोर्ड के सामने से गुज़रना बेहद कठीन मगर संभव काम है।

मैं सोचने लगा, ये आदमी बड़ा काम का है।हर मौके पर बारीक सोच रखता है। अलहदा राय रखने के मामले में तो खैर अव्वल है ही।मैं उनके फ्लेक्सिबल कॉमरेडी चिंतन और पर्याप्त प्रगतिशील नज़रिए को सलाम करता हूँ।बातों को ठीक-ठाक तरीके से ज़बान से सरकाते हुए सामने बैठे श्रोता के दिमाग में फिट करने का उनका बरताव और उनकी हार्दिक इच्छा बड़ी गज़ब होती है।असल में जब एक आदमी के मन में पाप नहीं हो तो वो अपने वक्तव्यों में एक असरकारक ऑरेटर साबित हो ही जाता है।

बधाई हो राजेश जी,इधर-उधर मत झाँकों। मेरी ये टिप्पणी आप पर ही केन्द्रित है।राजेश जी को पहली मर्तबा सार्वजनिक तौर पर थेंक्यू कि आप मेरी डायरी पढने और उसमें हिन्दी की अशुद्दियां सुधारने की मुहीम में मेरे लिए प्रियतर होते जा रहे हैं।मैं उस वक़्त तक गलतियाँ ज़रूर करूंगा जब तक आप उन्हें सुधारते रहेंगे।ये भी क्या रिश्ता रहेगा।अनौपचारिक रूपेण गुरू-चेला।
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'आदमी गलतियों का पुतला होता है।' ये कोई सूक्ति नहीं है जिसे बार-बार केवल उपयोग करके छोड़ दिया जाए। आत्म निरीक्षण के अमर प्रेरक और एक अलार्म के माफिक हमें अपनी कमियों पर खुद को केन्द्रित करने को कहता है।वैसे आदमी को अपनी कमियाँ जानने के लिए बहाने चाहिए।साथ ही कमियों पर कड़वे बयान सुनने को दिल गुर्दे मजबूत। मेवाड़ी हलके के अपने दोष के कारण मुझे 'ऐ' की मात्रा का सही उपयोग आया ही नहीं।यहाँ मैं उन तमाम लोगों को कठघरे में खडा नहीं करना चाहता जिन्होंने मेरे उच्चराण को आकार दिया। मगर मैं उन्हें बहुत 'मिस' करता हूँ।

उच्चारण की अशुद्दियां जानने के लिए मैं आकाशवाणी का आभारी हूँ जहां प्रकाश खत्री जी जैसे वरिष्ठ उदघोषक कभी कभार ही नहीं हर ड्यूटी में एक दो शुद्दीकरण करके ही छोड़ते हैं।हर बार ढ़ंग के शब्दकोष खरीदने की ठानकर मैं आगे बढ़ जाता हूँ।आगे बढ़ने के बाद भी शब्दकोष नहीं खरीद पाना असल में मेरे लिए पीछे जाना साबित हो जाता है। शब्दकोष खरीद उन्हें अलमारी में कैद कर देना तो और भी पीछे जाना।दूजे अधिकारी हमारे प्रोग्राम ऑफिसर योगेश जी कानवा हैं जो अक्सर अपनी आदतवश टोंका-टोकी से मुझे दुरुस्त करते हैं।ऐसे इंसान की संगत ज़रूर करिएगा।निडरता के साथ।सानुशासन।

यहाँ उच्चारण सुधारने में 'वसुधा' पत्रिका का शुक्रिया कि वे शब्दों को नुक्ता आदि के साथ छापते हैं ताकि हमें बोलते हुए पढ़ने में दोहरा लाभ मिल सके।अरे हाँ इस लिहाज से तो बहुत से अखबारों ने हमारा उच्चारण खराब किया है।जो 'ज़िंदगी' को 'जिन्दगी' लिखते रहे।खैर ये दूजा विषय खुल जाएगा।डॉ सत्यनारायण व्यास के शब्दों में कहूं तो 'मक्की की बोरी खुल जायेगी तो फिर संभलेगी नहीं।'

ये तीन श स ष तो गले की फांस हैं।उर्दू के नुक्ते बाप-रे-बाप।ऊपर से हमारे गंवई बचपने और बोली का दुष्प्रभाव।रेडियो की नौकरी में हूँ तो बार-बार हिंदी से जुडी गलतियों पर खुद में झाँकने की सोचता हूँ। वरना मित्रों की हिन्दी बोलीचाली से तुलना करने बैठूँ तो रेडियो की नौकरी से भी हाथ धो बैठूँ।खैर अब-की बार तीन-चारे-क शब्दकोश नक्की कर लिए हैं।गोया अंग्रेजी-हिन्दी का फादर कामिल बुल्के शब्दकोश,  रामचंद्र शुक्ल का नारिक प्रचारिणी सभा से प्रकाशित हिन्दी शब्द सागर, अंग्रेजी का ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश और ज्ञानमंडल लिमिटेड,इलाहबाद का हिन्दी साहित्य कोश।एकाध उर्दू का भी मांगना तय किया है।
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अचरज की बात ये कि जो लोग 'क्लासिक' होने का ढ़ोंग करते हैं। क्लासिक संगीत और नृत्य के सच्चे 'समर्थक' और 'प्रशिक्षक' कहे जाते हैं।क्लासिकल मौसिकी में रूचि की बातें बनाते हैं।नगर में बड़े दिनों बाद और मुश्किल से आयोजित, लगभग दुर्लभ कार्यक्रम में नदारद मिलते हैं।गज़ब का दोगलापन है। मुझे फिर बाद में याद आया कि  वे तो वैसे भी 'जानकार' हैं अब उन्हें और जानने/सुनने/देखने/समझने की ज़रूरत नहीं।
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आखिर में तीन वाक्य लिखूंगा जो मैं अक्सर फोन पर दूसरी तरफ से आती आवाज़ में शुरुआती वाक्यों की तरह पाता हूँ।

माणिक जी की जय हो।
आज के आनंद की जय हो।
जब तक सूरज चाँद रहेगा,माणिक  जी का नाम रहेगा।

ये 'अमर वाक्य' जो मुझे प्रेरित तो करते हैं मगर गफलत में नहीं डालते।हमारे एक वरिष्ठ मित्र डॉ चेतन खमेसरा के हैं।कभी-कभार तो मैं भी उनके बोलने से पहले ही ये ही तीन वाक्य फोन पर गड़प देता हूँ।बड़े आत्मीय है।मूल रूप से विज्ञान के हैं।अभियंता है जिंक,चित्तौड़ में।यहीं चित्तौड़ के अहिंसानगर यानी कहे तो चामती खेड़ारोड़ पर रहते हैं।हर रविवार उदयपुर अपने माँ-पिताजी के पास जाते हैं।हमारे रविवारीय आयोजनों में कभी आ नहीं सके।रपटें पढ़कर सदैव प्रेरित करने के साथ ही अच्छी कामनाएँ व्यक्त करना नहीं भूलते हैं।हमारी 'धामाचौकड़ी' उन्हें बेहद पसंद है।वे अब भी जवान हैं। मगर उनके और युवा होने की उम्र में वे भी ताबड़तोड़ ढ़ंग  से सक्रिय थे।विद्यार्थी परिषद्,युगधारा आदि के होकर भी अतिप्रगतिशील।खैर मैं उन पर कोई 'छापा-छापी' नहीं लगाना चाहता। एक आदमी जो हमारी गतिविधियों पर पैनी नज़र रखे और फोन-फान से खबर लेता-देता रहे हमारे बहुत करीब से दिखते लोगों की बनिस्पद बड़ा काम का नज़र आता है।उनके घर पर एक दिन शाम की चाय के साथ जमावड़ा लगायेंगे इसी वादे के साथ डायरी पूरी।

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