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07 अगस्त, 2013

'विधान केसरी' के परिशिष्ट में छपी अपुन की एक कविता


(1 )इतनी आसानी तो कभी नहीं थी ?

इस दौर में आसान हो गया है
रिश्तों के रेतने की तरह
बेमतलब की कविता करना

इससे भी सरल
कुकविताओं का छप जाना
मित्र पत्रिकाओं में

पढ़े बगैर पुस्तकों पर
टिप्पणी करना सरल हो गया है
औरतों के अधिकारों को
देह की आज़ादी में तब्दीलने की तरह

कितना कुछ शामिल हो गया है
आसान कामों की फेहरिश्त में
इन सालों

ईरोम की हालत पर चुप रहने से लेकर
जंगल-ज़मीनें हड़पना
खदेड़ना वनवासियों को कहीं दूजी जगह
पहाड़ों-खदानों को बेचना
बेचना-खरीदना लड़कियों को
एकदम आसान हो गया है
ज़रूरी मुद्दों को बहसों-विमर्शों में
उलझाने की तरह

कितना कम मुश्किलभरा काम है
खेत में  खपती एक स्त्री पर
एक ठाले आदमी का अकारण झेंपना
छोड़ देना बीमार को खुले आम
जेवड़ी-ताबीज और मन्तरे हुए काले-हरे डोरों के भरोसे

सीधे हाथ का खेल है
बस्तियां जलाना
जंगल खाली कराना
और उजाड़ना गाँव के गाँव

कहे पर मुकर जाना और
दबे को और दबाने की तरह
सबकुछ सरल

सहसा आसान हो गया है
कवियों को पढ़े बगैर कवि हो जाना
कहानियां लिखना हुआ सुगम
पहले से छपी कहानियां पढ़े बगैर
वर्णों के बजाय लकीरें खींचने की अनुमति की तरह
चौतरफा आसानी हो गयी है

सच में सबकुछ कितना सहज हो गया है
परिवार समेटने की जुगत में
माँ-पिताजी को अकेले छोड़ देने की तरह

  • माणिक 
    अध्यापक 

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