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24 सितंबर, 2013

24-09-2013


  1. अफसोस हमारे देश में 'कवि सम्मलेन' को ही साहित्यिक आयोजन का चरम मान लेना कितनी बड़ी भूल हो रही है, काश हम समझ पाएं।साहित्य के नाम पर हमारी ज़ुबानों पर गलत स्वाद का चटका चस्पा करने के इस पूरे 'खून-खराबे' के लिए यह पीढ़ी इन हंसौड़ अमित्रों को मुआफ़ नहीं करेगी।हमारी दिनचर्या में भौंडापन इतने गहरे में पैठ गया है कि इसे पैंदे तक खुरच पाना बड़ा मुश्किलाना काम लगने लगा है।फिर भी एक 'हाका' करने में क्या हर्ज है।हंसी-ठठ्ठा करने पर प्रश्नचिन्ह लगाना हमारा मकसद नहीं है। असल में यह इन कॉमेडी शोज के ज़रिये हमारे समाज और संस्कृति में सुचिता के आंकड़ों पर ध्यान केन्द्रण का मसला है।वैसे तो पूरे महासागर में भांग है जनाब,मगर फिर भी ध्यान भटकाने के इन तमाम तामझाम से जितना बचके हम अपने लिए वक़्त निकाले और कुछ गहरा सोच सके तो फायदे में रहेंगे।
  2. नेटवर्किंग साईट पर कुछ साथी गुड मोर्निंग और गुड नाईट भी इतने जोरदार तरीके से बैनर वगैरह टांग कर करते हैं मानों बड़ी मुश्किल से जान बची हो और लम्बी रात के बाद सवेरा हुआ हो या फिर दिनभर के सफ़र में मरते मरते बचने के बाद रात आयी हो.इतना ढकोसला करने के बजाय किसी अच्छे बयान में कलम घिसाते या फिर कुछ 'गैर-रटंत' वाक्य लिखते तो उनके विचारों से वाकिफ होने का मौक़ा मिलता।
  3. शहर में कभी ऐसा दस बाई बीस का कोई होर्डिंग देखने में नहीं आया जिसमें विशुद्ध रूप से किसी ढंग के साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन का मसला छपा हो.असल में इतने बड़े होर्डिंग के लिए डेढ़ हजार रूपए फ्लेक्स प्रिंट के और पंद्रह दिन तक टांगने के चार हजार रूपए लगते हैं.इधर इतने में तो ढंग के चार वक्ता बुलाए जा सकते हैं
  4. कुछ कविताएँ छपने भेजी थी,अब 'लापता' की श्रेणी में आ गयी है क्योंकि न तो तथाकथित बड़े संपादकों ने जवाब दिया हैं. न ही नकारा हैं.अब नकारना झेलने से ज्यादा उनका अनबोला रह जाना खलता है.ऐसे में निराला की 'जूही की कली' बार-बार याद आती है
  5. एक इंटरनेटबाज आदमी के घर अगर लाईट चली जाए उपर से इंवर्टर भी नहीं हो और लगे हाथ दिनभर से शहर को गीला कर रही बारिश एकदम तेज़ हो जाए तो वक़्त गुजारने के लिए उसके पास बाकी बचे रास्ते बड़े इंटरेस्टिंग होते हैं। पहला चार साल की उम्र पार बेटी के साथ बातचीत का सुख, दूसरा किचन में अर्धांगिनी का हाथ बंटाना, तीसरा अरसे से नहीं बजे रेडियो पर लोक गीत सुनना या कि फिर सेलफोन से मेमोरी कार्ड के वे गीत सुनना जिनसे यादों में जाने के लिए एक सहूलियत अनुभव होती है
  6. वैसे अपनी भड़ास जाहिर करने के कई ज़रिये इस वर्चुअल दुनिया में मौजूद है फिर भी अपने बयान फेसबुकी मंच पर देने से कुंठा निकलने के चांस है जनाब।अपनी वॉल पर खाली 'गुड मोर्निंग' कहके गायब हो जाने या फिर लोगो के ठीक-ठाक मसलेप्रधान स्टेट्स पर अपना वही एकममेव अमर वाक्य 'गुड मोर्निंग' चस्पा करने से लगेगा अच्छे खासे बैनर पर कोई गोबर चोपड़ कर चला गया

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