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09 फ़रवरी, 2014

09-02-2014

फ़िल्मकार  मेघनाथ जी 
इस बात में रत्तीभर भी अचरज नहीं है कि हमारे आसपास की संगत हममें कुछ जोड़ती ही है.कभी-कभार ऐसा भी हो पड़ता है कि हम किसी बैठक में जाजम उठाने तक वह नहीं रहते जो संगत के शुरुआती बिंदु पर जाजम बिछाने के वक़्त होते हैं.कुछ न कुछ जुड़ ही जाता है.रात में रोज़मर्रा के काम निबटाने के बीच ही सहसा एक लिंक हाथ लगा.असल में ज़रूरी कागजात संभालते वक़्त बेतरतीब चीज़ों को अवेरते फोल्डर में उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल का एक ब्रोसर  हाथ लगा.फ़िल्मों की सूची में एक थी फ़िल्म 'गाड़ी लोहारदगा मेल' इसे हमारे हमविचार साथी 'मेघनाथ' और 'बीजू टोपो' ने बनाया था.

'मेघनाथ' और  'बीजू टोपो:दोनों से मैं मिला नहीं,बतियाया नहीं,इनका लिखा पढ़ा नहीं,इनके साथ चाय नहीं पी,न ही सिगरेट फूंकी और तो और इनकी शक्ल अभी तक तो नहीं ही देखी है.मगर एक आभास मेरे साथ है जिसमें लगता है इनके साथ एक बड़ी संगत हो चुकी है जिसका असर अब बहुत भीतर तक अपना रंग जमा चुका है.ज़रिया था सिर्फ सताईस मिनट की ये फ़िल्म 'गाड़ी लोहारदगा मेल'.सन दो हजार छ: में आयी ये फ़िल्म मेरे जैसे फिसड्डी के पास अब जाकर पहूंची.इस अंतराल और देरी का दोष सिर्फ और सिर्फ मेरे माथे ही पटका जाए तो मुझे तसल्ली होगी.

फ़िल्मकार बीजू टोपो जी 
इस बहुत विपरीत समय में बेहतर संगत ढूँढने के दिन लद गए लगते हैं जो कोई अच्छी अनुभूति और सही संकेत नहीं है.सही दिशासूचक मित्र,असलियत परोसती  फ़िल्में ,ग़लतियों पर डाटते गुरुजी,लफंगों के साथ टाइमपास करने की शिक़ायत पर गुस्सा होते पिताजी,अपनी तबियत को लेकर लापरवाही पर सलाहें देती माँ-बड़ी जीजी सबकुछ, बिसरे हुए बिम्बों की सूची का हिस्सा बन गए हैं.इस सूची के ओर लम्बे होने का ज़िम्मा हमें खुद पर ही लेना होगा.क्यों कि दोष हमारा ही है शायद.फिलहाल यही अहसास बड़ा प्रबल है कि बहुत तेज़ी से हमारे बीच एक आदमी होने के लिए स्थितियां लगातार कम पड़ती का रही है.आदमियत को ज़िंदा रखना या उसमें जान फूंकना वक़्त की बड़ी ज़रूरत हो गयी है.इसी तरफ इशारा करती है 'लुप्तप्राय' दृश्यों को जगाती यह ट्रेन केन्द्रित फ़िल्म 'गाड़ी लोहारदगा मेल' जो असल में अपने केंद्र में 'जीवन' को रख रही है ट्रेन तो एक बड़ा बहानाभर ही समझना.

फ़िल्म में चार डिब्बों की रेल हैं,कैमरे के सामने आती संभवतया नैरो गेज की पटरियां हैं ,मटमैला इंजन है , पुराने टाइप के सिग्नल, देसी ख़ुशबू देते गाँव, आरामतलब सवारियां और डिब्बों की खिड़कियों के बाहर लटके सब्जियों के टोकरे-दूध की टंकियां ही हैं.फ़िल्म में यों तो कहानी गायब है मगर फिर भी इसमें एक कहानी तो है जिसे हर दर्शक अपने ढ़ंग से तैयार करता हुआ पूरी करता है और समझता भी है.फ़िल्म में अमूमन फिल्मों की तरह कोई एक हीरो नहीं है.विलेन तो बिलकुल भी नहीं.एक रंगीन और जीवंत संस्कृति का परिचय देती फ़िल्म है 'गाड़ी लोहारदगा मेल'.

लाईट-कैमरा-एक्शन जैसी शब्दावली से कोसों दूर बिना किसी तामझाम के यह डॉक्युमेंट्री हमें उस देशज कल्चर से एकमेक कर देती है.फ़िल्म में लगभग बिना वाद्ययंत्रों के बजने वाले गीत शामिल हैं.गाने और सुनने वालों में सभी हम जैसे ही हैं.एक भी चेहरा हाई प्रोफाइल कलाकार का नहीं.एक बारगी लगा हमारी ही तरह का आदमी हमारी फ़िल्म कह रहा है.आम आदमी को बयान करती हुयी इस मूवी में सामान्य यात्रियों की बतकही ही है.ट्रेन रुकती है,लोग चढ़ते हैं,स्टेशन पर पापड़-भुंगड़े-फुल्लिये बेचते घुमक्कड़ व्यापारी ट्रेन के नजदीक आते हैं,खरीद-फरोख्त होती है,सीटी बजती है और ट्रेन फिर चल देती हुयी फ़िल्म को आगे बढ़ाती है.सबकुछ बहुत कम आपाधापी के बीच  ही संपन्न होता है..सबकुछ बहुत धीमे-धीमे. पूरे सताईस मिनट में कोई दो चार स्टेशन और वहाँ की चहल-पहल ही फ़िल्म का मसौदा बन पायी है.एकदम यथार्थ.हमारे देश के ही एक हिस्से का लोक.सबकुछ पहली दफा और लगभग आश्चर्य के करीब का-सा.विश्वास करने को थोड़ा मुश्किलाना.(मित्रों की सुविधा के लिए फ़िल्म का यूट्यूब लिंक ये रहा)

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