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03 मार्च, 2014

03-03-2014

दोस्त भी अजीब हैं.ये दोस्त तब के हैं जब मैं विचार और दिशा के पॉइंट ऑफ़ व्यू से बहुत घालमेल में था हालाँकि कमोबेश घालमेल अभी भी मौजूद है,फिर भी तब ज्यादा था.तब के दोस्तों को आज देखता हूँ तो खुद को अजायबघर में पाता हूँ.इस चर्चा में बहुत बाद के साहित्यिक मित्रों को अलग कर रहा हूँ जिनसे आजकल बहुत एका है.एक दोस्त गज़ब का फाँकलेट है बोलता है तो उसे ढाबना मुश्किल हो जाता है.लंबा-जम्बा कद काठी का आजकल निम्बाहेड़ा में रहता है.कोचिंगे पढ़ा के खुद का मकान बना लिया है.बच्चे ठिकाने के स्कूल में दाखिला पा गए.गाड़ी-घोड़े,मित्र-मंडली अच्छी जमा ली है.खासी तनख्वाह है. मास्टरी जो करता है.शहर में पत्नी और दो बच्चों के साथ मजे में हैं.गाँव की पृष्ठभूमि का है उसे अपने शुरुआती दौर की ज़मीन का ख़याल है.हवा में नहीं उड़ता,जब उड़ता है तो हम टोंकने मुस्तैद रहते हैं.है पढ़ाकू,आजकल आरएएस के इंटरव्यू की तैयारी कर रहा है.वो न कामरेड है न दक्षिणपंथी.हाँ क्रिकेट उसके लिए राष्ट्रीय मसला है.राजनीति की खबरें उसे खुद में अटकाए रखती हैं.नोट्स अच्छे बनाता है.बातों का उस्ताद है.घूमने का शौक़ीन.दिखावों की दुनिया से दूर ही है.अपने गाँव जाता आता रहता है.माँ-पिताजी उसके भी गाँव नहीं छोड़ना चाहते,और इधर वो शहर छोड़ नहीं सकता है.देशभर के अमूमन युवाओं की तरह वह भी मध्यमवर्गीय जीवन जी रहा है.नाम है जीतेन्द्र सुथार.हम टीचरी के लिए किए एक डिप्लोमा के समय के दोस्त हैं.तब के जब एक जवान टीनएजर विपरीत लिंगी आकर्षण के दौर से गुज़रता हुआ किसी के बाप की नहीं सुनता है.उस कॉलेज की दुनिया में हमारी फाकामस्ती पर फिर कभी ज़रूर लिखूंगा.

दूजा दूजे गाँव में हैं.संयुक्त परिवार में है.भाई,भोजाई,पापा,मम्मी,दादी,पत्नी,बेटी,बेटा सबकुछ.सुदर्शन चेहरा है.अच्छी लिखावट.बोलचाल  में संयमित और हिन्दी का जानकार.गोर वर्ण,कद लंबा.कल ही उसकी शादी की आठवीं सालगिरह थी तो हमने आधा किलो जामुन और ढाई सौ ग्राम नमकीन के बाद चाय से मनाई.उसे सुलझे हुए सरल और सुगम जीवन जीते देखने के बाद इनदिनों के संघर्षों में देखते हुए मैं भी भीतर से बहुत दुःख में हूँ.बकौल प्रवीण कुमार जोशी वाया पंहुना परेशानियां कभी-भी आ सकती है.आपका व्यवहार और कनेक्शंस आखिर कभी-तो काम आते ही हैं.धैर्य बड़े काम की चीज़ है.पुलिस से काम कराना बहुत टेड़ा है.कोर्ट के चक्कर और वकील की धाराओं वाली जुबां आदमी को लंगड़ा कर छोडती है.रहमदिल इंसान को लोग जीने नहीं देते.समाज बड़ा दोगला है.लोग वो तो नहीं ही होते जो दीखते हैं.बुरा वक़्त है कट जाएगा.इन्हीं दिक्कतों के बीच हमें अपना निशाना साधना हैं.ये रुकावटें हैं टल जाएगी.आस और हिम्मत ने आगे बढ़ाया है.हम विजय वरेंगे.गृह क्लेश और चौतरफ़ा मुसीबतों के बीच साहित्य-फाहित्य,किताबें-विताबें,गोष्ठियों-सम्मेलनों का ज़िक्र और चर्चा बेमानी लगती है.हमारे केंद्र में जीवन ही होना चाहिए और उसकी सचाई कभी-कभी हमारी परीक्षा लेती है.हमारे अभी तक के पढ़े की परीक्षा फिर से होती है.मुश्किलें ख़त्म होगी तो दूजे विषय पर बात करेंगे.परेशानी में दोस्त की तरफ से साता पूछने का एक फोन कॉल ही दिलासे के लिए काफी है.

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