Loading...
10 अप्रैल, 2014

10-04-2014


  • रिश्तों में बाज़ार इस कदर घुस गया है कि बिना काम न कोई बात करता है न कोई मुस्कराता है.उल्टे जो खुलकर बतियाए और मुस्कुराए हम उसे शक की निगाह से देखने लगते है.आगे जाने क्या-क्या होने वाला है?देखते रहो,चलते रहो,सोचो मत,सोचने का काम इंसानों का है मशीनों का नहीं.
  • घर के टेंक में से साँप पकड़ कर निकालना और मसलना एक काम है और साँपों पर किताबें पढ़कर समीक्षा लिखना,साँप केन्द्रित कविता-कहानी करना दूसरा काम है.(आज टेंक में से साँप का बच्चा निकालने के लिए फिर मुझे अपने लंगोटिया दोस्त रजनीश साहू को चाय पर याद करना पड़ा जो पिछली दो बार से मेरे घर आये साँप पकड़ मार चुका है)
  • हमेशा एक ताज़ा अनुभव के माध्यम से मैं हमेशा जनरल कमेन्ट करता हूँ.मेरा अर्थ यहाँ उन तमाम लोगों से है जो दिखावा इतना करते हैं कि किसी संगीत सभा के सबसे अच्छे जानकार वही हैं वे सभा में आते भी हैं मगर जब वे किसी शास्त्रीय सभा में बंदिश के ठीक बीच में ही उठ चलते हैं तब यह ज़ाहिर हो जाता है कि उन्हें सुनने की तहजीब भी नहीं है.असल में हमने चीजों को इतना मनोरंजन के ढ़ंग से लेना शुरू कर दिया है कि हमारी भारतीयता कहीं छूटती जा रही है.अचरज तब भी नहीं होता जब आज विदेशी लोग हमारे देश में आकर यहाँ की हिन्दी सिख कर हमें ही सुना रहे हैं.वे हम से ज्यादा भारतीय हैं.वे हम से ज्यादा तहजीब के साथ भारतीय संस्कृति को तवज्जो देते हैं.
  • बात चली है इसलिए कहना चाहता हूँ कि स्पिक मैके में ऑडियो-विडियो रिकोर्डिंग निषेध है दूसरी बात जब ऑडियो विडियों ही देखना होता तो हम यूट्यूब ही कर लेते.नेट पर दुनियाभर के नाचगान के विडियो संस्करण है जिनसे हम बुरे वक़्त में काम चला ही लेते हैं.खैर किसी प्रस्तुति का सजीव आनंद लेते वक़्त ज्यादा ऑडियो-विडियों,फोटोग्राफी के चक्कर आदमी को असली आनंद से दूर ले जाते हैं.ऐसी बात कहकर मैं चीजों के दस्तावेजीकरण को नकार नहीं रहा मगर मेरा मानना है कि किसी प्रस्तुति के आप बहुत सारे फोटो लेके घर आयें तो आप पायेंगे कि आपके पास बहुत से फोटो ही है. रोमांचित होने के सारे अवसर आप तब ही खो चुके थे जब ऑडियो रिकोर्डिंग,विडियों शूटिंग और फोटोग्राफी में मगन थे.
  • बचपन में हमारे कई-कई नाम होते हैं बड़े होते होते एक ही नाम रह जाता है.सुनने और बोलने में एक विविधता गायब हो जाती है.सब सभ्य हो जाते हैं और सलीक से ही बात करते हैं.हो सका तो लोग आगे श्री और पीछे जी भी लगा जाते हैं.कभी कभी जी करता है कोई हमें हमारे बचपन के किसी एंडे-बेंडे नाम से बुलाए (चीजें हाथों रिपसती जा रही है )
  • परदे के पीछे से बोलने की आदत वाले आदमी को अचानक कि कहो कोर्डलेस खराब है आप मंच के लेक्चर स्टेंड से बोलिए,आवाज़ में फरक पड़ जाता है.बहुत से चेहरे दिखने लग जाते हैं.देखने और फिर बोलने में तालमेल बड़ा मुश्किल है.लोगों को पहचानते हुए बोलने और मौके तलाशकर बोलने के आदत हमें कम ही है.माइकफोबिया मतलब 'माइक चिपकू' कभी रहे ही नहीं.एक आदमी जो सालों से पहचान छिपाकर मंच साधना चाहता था अचानक उतरे हुए नकाब के साथ स्टेज पर आता है.इस उठे हुए परदे से एक हुनरमंद सभी की आँखों में आ जाता है सब जान जाते हैं कि आदमी कौन था आदमी कौन है.इत्तिफाक से कपड़े नए और ईस्त्री किये हुए थे.मामला बैठ गया.दूकान चल निकली.  (शुक्रिया साउंड मैनेजर)
  • जिसे 'गंभीर श्रोता' समझा, स्याला वही बंदिश के एकदम बीच में प्रस्तुति छोड़ चल पड़ा.
  • चित्तौड़गढ़ की युवा पीढ़ी में मुझे असल मायने में 'सांस्कृतिक एक्टिविस्ट' की भूमिका वाले युवा देखने का मन है जाने ये मुराद कब पूरी होगी या फिर ये सपना ही हमारी मंझिल है और चुनौती भी.
  • मौजदा समाज में बहुत सी चीजें छीजती जा रही है उनमें से ही एक है आलोचना करने की समझ और आलोचना सहने की शक्ति
  • जबसे स्पिक मैके में हूँ और ओवरनाईट आयोजनों में कलाकारों के क्रम तक को लेकर अपना एक विज्ञान देखा है वहीं चीजों को घालमेल कर परोसने वालों को देख इन आयोजकों पर दया आती है.लाखों रूपए का बेतरतीब खरच देखा है. एक ही मंच,एक ही संत,एक ही निर्धारक. स्टेज पर ठुमरी,तत्कार,नृत्य नाटिका नाची गयी सबकुछ कथक/भरतनाट्यम/ओडिसी.वहाँ तक सबकुछ राजीखुशी.उसके ठीक बाद 'सिंह इज किंग','हुकुम का इक्का बोस', 'इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों' जैसे गीतों सहित 'रामलीला','देवदास' सरीखी फिल्मों के गीत भी परोसे गए.फिर कुछ गीतों के बाद अक्कड़-बक्कड़ बाम्बे बोर टाइप के गीत.राम-राम-राम.इतना बड़ा समूह,इतनी अच्छी दर्शक दीर्घा फिर ये चयन में गड़बड़ी में क्यों.सबकुछ अच्छे के बीच एक ओर्केस्ट्रा टाइप की बुद्धि क्यों.अनुभव की प्रस्तुतियों में तालियों पर जोर क्यों.दिशा देती सुबहों के बीच आयोजन में ये शामें दिशाहीन क्यों.सब चलता है.यहाँ कौन इतना सोचता है.किसको फुरसत है.सब दिन की थकान उतारने आते हैं.
  • मुरारी बापू की चित्तौड़ में आयोजित रामकथा के दौरान शाम के आयोजन भी लगातार जारी है एक दिन शाम जयंती माला करके कत्थक नृत्यांगना के समूह ने अपनी प्रस्तुति दी.मेरा भी जाना हुआ.एक दो भक्तिपरक प्रस्तुतियों के बाद उन्होंने फ़िल्मी गीतों पर कथक नाचा.पहले पहल जो गीत आये उनमें भगवान् कृष्ण का ज़िक्र कहीं न कहीं ज़रूर था.फिर आख़री हिस्से में जो गीत आये वे शास्त्रीय राग बेस्ड ज़रूर थे मगर वे तमाम गज़लें उमराव जान,पाकीज़ा,देवदास सरीखी फिल्मों से संकलित थी.ठुमरियां थी,मुजरा स्टाइल के गीत भी थे.मैंने एक से एक बड़े कथक कलाकार देखे और सुने हैं मैं पूरे कार्यक्रम में असहज ही रहा.असहज क्यों रहा इसी में इस स्टेटस के लिखने का कारण छिपा है.कथक को समसामयिक बनाना ग़लत नहीं है मगर उसके मूल स्वरुप को ठीक से पेश करने के बजाय कथक के नाम पर फ़िल्मी कथक पेश करना किसी भी आयोजन की गरिमा को गिराना है.सारी पब्लिक का स्वाद कमोबेश एक जैसा है वही रहा-सहा बेहतर स्वाद ये वैश्वीकरण एक कर देगा.मेरा अर्थ यहाँ चीजों के घालमेल से है.मुझे यह समझ नहीं आता कि आयोजनों को समीक्षात्मक दृष्टि से लेना भी बहुत मुश्किल क्यों होता जा रहा है.
  • चित्तौड़ में बीते दिनों एक मुशायरा हुआ उसमें जिन दो शाइरों ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया उनमें एक नोएडा के शकील जमाली और दूसरे जोधपुर के वरिष्ठ शाइर शीन काफ़ निज़ाम साहेब थे.शकील जमाली का पढ़ने का अंदाज़ और शेर देशकाल के वर्तमान और यथार्थ के करीब लगे वहीं हमारे जीवन के आसपास के अनुभवों से बहुत बारीक दृष्टि के साथ शीन काफ़ निज़ाम साहेब ने बहुत उम्दा गज़लें और उनके चुनिन्दा शेर पढ़े.
  • इस मुश्किल सफ़र में सबने दिया यूं साथ,ये हमारा नहीं असल में हमारी नियत का कमाल था
  • शहर में मुरारी बापू आये हुए हैं रोजाना रामकथा करते हैं.आठ अप्रैल तक चलेगी.करोड़ों का मुआमला है.विशाल पांडाल,बड़ी-बड़ी टीवी स्क्रीनें.अबाध चलती भोजनशाला.लगातार आते-जाते भक्तजन.अच्छा और धार्मिक माहौल है.वे भी मीरा को महान भक्त ही समझते हैं.वैसे राम कथा में मेरी रूचि कम है मगर उन्होंने लगभग रोजाना शाम विभिन्न रुचिकर आयोजन भी प्लान किए हैं शाम के इन सत्रों में मेरी रूचि है.बाबाओं को लेकर देशभर में लगातार और समय-समय पर भले बहुत सी वैचारिक बहसें शुरू हुयी और ख़त्म हुयी हो मगर मैंने देखा है कि मुरारी बापू का अंदाज़ और श्रोता-दर्शक अलग दिखते है.उनका रास्ता थोड़ा अलग है.आज शाम अहमद हुसैन-मुहम्मद हुसैन की प्रस्तुति है.जाने का मन है.एक दिन मुशायरा है.एक दिन कथक भी होगा.एक दिन शायद भजन संध्या जैसा कुछ है.हो सका तो एक दो आयोजन में जाउंगा.शहर में बापू का यह पहला प्रवास है.सर्व धर्म समभाव की उनकी दृष्टि को मेरा नमस्कार और स्वागत
  • कविताएँ हमें यथासमय दुरुस्त करती रहती हैं

0 comments:

टिप्पणी पोस्ट करें

 
TOP