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10 सितंबर, 2014

10-09-2014

  • इन दिनों की व्यस्तता के बीच कोई भी कविता नहीं उपजी.बहिन के कल लड़की हुई.बेटी के अठारह से परीक्षाएं हैं.मित्रों से शहर में मिलना भी लगातार टलता जा रहा है.कल कथक नृत्यांगना शालिनी शर्मा जी और जयपुर के ओमेन्द्र मीणा जी की चित्तौड़ में नौकरी जोइनिंग के बाद मिला.पेंडिंग काम की लिस्ट कुछ ओछी पड़ी.राशन आया.कुछ पत्रिकाएँ भी आयी.'मधुमती' में कुछ मित्र छपे हैं उन्हें पढ़ना है.'हँस' अरसे बाद रेलवे टेशन से खरीद लाया.मंतव्य का प्रवेशांक हरे भाई ने ई-मेल से भेजा है.पहली फुरसत में पढ़ना फिर शुरू.छुट्टियां कम और काम ज्यादा है.उपरी आदेशों के बोझ तले दबा हुआ आदमी.भीतरी स्फूर्ति के भरोसे दिन कट रहे हैं.शहर बारिश से तरबतर.दो आयोजनों के बीच का अंतराल और उससे उपजा आराम.मित्रों के बीच लगातार की बहसें और मन में बैठे भिन्न आकार वाले कोंसेप्ट के खाकों में लगातार के परिवर्तन.
  • कभी अवार्ड बड़ा होता है कभी अवार्ड देने वाला,कभी-कभार अवार्ड की राशि और कभी ऐसा भी होता है जब अवार्डी व्यक्ति बड़ा होता है.मौके-मौके की बात है.कभी अवार्ड ठुकराए जाते हैं तो कभी लपके जाते हैं.'अवार्ड संहिता' की लीला एकदम निराली ही है."संतन को कहाँ सीकरी सो काम" भाई अब 'संतन' बचे ही कहाँ है ? सब जुगाड़ में बैठे 'असंतन' होने को आतुर हैं.
  • फोन पर हुई लम्बी बातचीत में हमारे मित्र सदाशिव जी कहते हैं कि वैचारिक जागृति जैसे बेहतर उद्देश्य को पाने के क्रम में हो रहे आयोजन में माध्यम की शुद्धता पर भी पर्याप्त बल और माध्यम के चयन में ज़रूरी स्क्रूटनिंग होनी चाहिए.बातें फिल्मों के चयन चल रही थी.'भोभर' का 'रेवत' जीवनभर शराब का सेवन करता है .उसकी ज्यादा शराब सेवन की आदत के चलते मदहोशी में रहने के कारण उसकी पत्नी 'सोहनी' दाम्पत्य जीवन में आयी एक गलतफहमी का क्लेरिफिकेशन भी नहीं कर पाती और दोनों घुटते रहते हैं.अजीब ये लगा कि 'रेवत' की इस शराबखोरी पर रेवत को पश्चाताप करते नहीं दिखाया गया है.हाँ एक जगह सोहनी ज़रूर उलाहना देती है.कहीं न कहीं फिल्म शराब पीने की आदत को ग्लेमराईज करती लगती है.खैर फिल्म किसी दूजे मुद्दे को ठीक से साधती है इसमें कोई शक नहीं है.समय और धन वहाँ खर्चना चाहिए जहां विचार हो,दिशा हो,आपसदारी हो,खुलापन हो,गाम्भीर्य हो,जानने और पाने के अवसर हों जैसे 'उदयपुर फिल्म फेस्टिवल और इसकी प्रतिरोधभरी संस्कृति
  • कुछ लोग एक साथ 'स्त्री' और 'स्त्री विरोधी गालियाँ' दोनों के पक्ष में हैं.गज़ब है.'हास्य-व्यंग्य' करना किसी किसी के बस का ही होता है और हरिशंकर परसाई होना तो बहुत ही मुश्किल राह है.भला आप ही बताएं स्त्री स्मिता विरोधी गालियों के हम कैसे पक्षधर हो सकते हैं.
  • मजबूरन अकेले नेतृत्व करना और चीज़ों पर अकेले ही कब्जा कर लेना: दोनों अलग अलग मुआमले हैं.फेसबुक पर ऐसे भी मित्र हैं जिनसे पहली दफा मिले तो लगा जाना कि हम जैसे 'छोटे आदमी' को वे पहचाने भी नहीं और फिर ठीक से मिले भी नहीं, तभी हमें लगा ऐसे ही होते हैं 'बड़े आदमी'.साहित्यिक आयोजनों में सादगी के आदी होने के बाद जब टीका-टिपकी,झालर-पन्नियाँ,झंडे-बेज,सोफे-मसनद,रंग-बिरंगी लट्टूड़ियाँ,कंकुपत्री जैसा आमंत्रण पत्र देखता हूँ तो कोफ़्त होती है.आपको? साहित्यिक आयोजन को ग्लेमराईज होते देख आयोजकों पर दया आती है.कभी-कभी रूचि और दायित्व में बहुत फ़र्क होता है,रूचि थी कि उदयपुर फिल्म फेस्टिवल के आगाज़ के मौके पर संजय काक जैसे ज़रूरी फिल्म एक्टिविस्ट को सुनता मगर दायित्व ये कि स्कूल खोलकर हमारे प्रधानमंत्री जी का सन्देश बच्चों को सुनाना था.
  • 'माणिक' बनने के क्रम में आज उन सभी गुरुओं को याद कर रहा हूँ 'जिन्होंने मुझे बिगाड़ा' (शीर्षक 'हंस' पत्रिका से साभार).वैसे शिक्षक सम्मान समारोहों में सम्मानित हो रहे उन सभी शिक्षक बंधुओं को बधाई जिन्होंने सम्मानित होने के क्रम में कोई जुगाड़ नहीं लगाया,योग्य थे और चयन हुआ.
  • कॉलोनी में सुबह चार बजे से एक माइक बीते तीन दिन से लगातार परेशान कर रहा है.भाई धार्मिक आयोजन किसी की नींद में खलल डाले ये कहाँ का धर्म है.आयोजनों का इस कदर उत्सवीकरण हमें कभी भी रास नहीं आ सकता.
  • कौन कहता है शास्त्रीय संगीत से आज के युवा दूर भागते हैं.कौन स्थापना दे रहा है कि शास्त्रीय संगीत धीमा है.बोरिंग है.अगर पंडित विश्व मोहन भट्ट जैसे जानकार कलाविद हों तो युवाओं को इस गहरे,बेहतर और असरकारक संगीत के फायदे तक पहूंचाया जा सकता है.कम से कम उनकी गलतफहमी दूर करते हुए उनका कोंसेप्ट ठीक किया जा सकता है.चित्तौड़ के मेवाड़ गर्ल्स कॉलेज में स्पिक मैके के एक आयोजन में पंडित जी से सौ भी ज्यादा छात्राओं ने औटोग्राफ लिए.
  • बीते दिनों दिनों गाड़िया लौहारों पर शोधपरक काम करते हुए एक रेडियो रूपक बनाने का मौक़ा मिला.आज जाकर प्रोजेक्ट पूरा हुआ.बहुत मेहनत वाला जीवन और रुका हुआ सा विकास.पिछड़ा हुआ समाज.अशिक्षा और बेचारगी.बाज़ार के मारे गाड़िया लौहार.संभवतया ये रूपक आकाशवाणी जयपुर से अठारह सितम्बर को राजस्थान दर्शन प्रोग्राम में प्रसारित होगा.आकाशवाणी चित्तौड़ के लिए ये मेरा तीसरा अनुभव था.इससे पहले बस्सी काष्ठ कला और आकोला की दाबू प्रिंट पर प्रोजेक्ट कर चुका हूँ.अपने इलाके को जानने के ये मौके बेहतरी की तरफ बढ़ाते नज़र आए.शुक्रिया चिमनाराम जी,नटवर त्रिपाठी जी और दिव्या.
  • चित्तौड़ को मुक्कमल शहर बनाता एक आदमी:डॉ.राजेश चौधरी जो एक चर्चा में कहते हैं ''फेसबुक,वाट्स अप,ट्विटर के युग में आज भी मिलने--बठने-बतियाने का कोई विकल्प नहीं है और हाँ कम्यूटर कभी किताब का विकल्प नहीं हो सकता है. 
  • खुश खबर यह कि हमारी दीदी और हिन्दी की जानकार डॉ.रेणु व्यास का राजस्थान विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर पद पर चयन हो गया है..बस उनके मन का हो गया.उन्हें बधाई.

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