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14 नवंबर, 2016

'हंस' पत्रिका का साल दो हज़ार चार में निकला दलित विशेषांक

मैं बीते दिनों 'हंस' पत्रिका का साल दो हज़ार चार में निकला दलित विशेषांक पढ़ रहा था जिसका अथिति सम्पादक के रूप में श्री श्योराज सिंह बेचैन और अजय नावरिया जी ने सम्पादन किया है.बड़ी गंभीर बात लिखी थी कि आरक्षण का लाभ ले रहे दलितों को इसका सहारा लेकर आगे बढ़ना चाहिए और खुद को मजबूत करना चाहिए बजाय इसके कि इसी को परमानेंट आधार बनाए.एक और बात दलितों को आगे बह्दते हुए सवर्णों से द्वेषता नहीं पालनी चाहिए क्योंकि द्वेषता का हासिल द्वेषता ही होगा.फिर तो वही होगा एक दिन दलित बहुत सक्षम हो जाएगे और तथाकथित ऊँची जातियों पर अत्याचार करेंगे और फिर संविधान उस दौर के दलित स्वर्ण को आरक्षण देगा.धीरे धीरे स्वर्ण फिर अपने हालात सुधारते हुए उपर उठेंगे और एक दिन फिर से आर्थिक रूप से सक्षम हो जाएँगे.और दलितों से अपना बदला लेंगे .

मेरा स्पष्ट मानना है कि बदले की आग में किया गया व्यवहार इस वक़्त को और ज्यादा खतरनाक बनाएगा.सभी की अपनी अपनी पीड़ा है जो एकदम वाजिब है.अनुभवजन्य पीड़ा को व्यक्त करना और उसे आक्रोश में बदलना दोनों अलग अलग दिशाएं हो जाती है.बजाय इसके खुद के वर्ग और जातिगत समूह को आर्थिक और सामाजिक रूप से प्रगतिशील और मजबूत बनाने पर जोर देना चाहिए.यही बात सवर्णों पर लागू होती है कि जब तक हमारी मानसिकता में दलितों को दलित ही समझा जाएगा.तब तक आरक्षण दिया जाता रहेगा और तब तक अवसरों से वंचित लोगों को संविधान प्रोटेक्ट करता रहेगा.

बीते दिनों राजस्थान लोक सवा आयोग द्वारा जारी नतीजों में आरक्षित वर्ग के नतीजों की कम अंक पर चयन की बानगियाँ लेकर बहुत माहौल खराब किया गया और द्वेषता का बाज़ार गरम रहा.यहाँ मेरा मत है कि जो कुछ हो रहा है निमानुसार और संविधान में लिखित नियमों से संचालित है.दूसरी बात बार बार अध्यापक,डोक्टर,इंजनियर आदि सरीखी नैक्रियों में क्वालिटी का रोना रोया जाता है.तो आप आईएएस और थर्ड ग्रेड की तरह टेट या सी-टेट जैसे एक्जाम सभी परीक्षाओं के लिए अनिवार्य करने की वकालात करें.बजाय किसी वर्ग से द्वेषता बढ़ाएं.एक विधवा और सामान्य अभ्यर्थी की क्या तुलना करें?दोनों की स्थितियां भिन्न है.मगर हमारे मुर्खानंद उनकी तुलना करके स्त्री विरोधी टिप्पणियाँ पेल रहे हैं.मज़ेदार बात यह कि टिप्पणियाँ तेज़ होती जाती है और बहस आगे बढ़ती है तो उनके दिमाग में भरा हुआ दोगली मानसकिता का 'घू' बाहर आने लगता है.

कुल जमा यह संख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व का मसला है.राजनितिक इलाके में भी और सरकारी नौकरियों में भी.वैसे भी इस देश में सरकारी नौकरियां है कितनी जो आप इतना परेशान होते हैं.अभी तो निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की वकालात चल रही है फिर आप क्या करेंगे.राजस्थान में निजी स्कूलों में पहली कक्षा में एक चौथाई बच्चे गरीब और वंचित वर्ग के साथ पढ़ेंगे आप क्या करेंगे? समय बदल रहा है.जैसे ओबीसी की मेरिट अब जनरल को छू रही है वैसे वैसे बाकी आरक्षित वर्ग में भी प्रतिभावान विद्यार्थियों को मौके मिल रहे हैं.वे अपने आपको प्रूव भी कर रहे हैं.अब आप कमज़ोर दलीलें देकर बहस को मोड़ मत देना.वंचितों को मुख्यधारा में लाना हमारे संविधान में वर्णित एक प्रमुख उद्धेश्य है.गैर बराबारी की यह खाई भरने तक यही चलेगा.हाँ आरक्षण के परफोर्में को रिफोर्म किया जाना चाहिए मगर देश में आज भी जातिगत भेदभाव भयंकर रूप से कायम है.आंकड़ों में जाएं.थोड़ा सा भारत भ्रमण करें.सलमान खान और अमिताभ जी की फिल्मों से फुरसत मिले तो कुछ डॉक्युमेंट्री फ़िल्में देखें.

आरक्षण का विरोध इसलिए क्योंकि एक दिन वे तमाम काम कल कौन करेगा? अगर दबे हुए और वंचित वर्ग के लोग नौकरियों में आ जाएंगे तो जिन्हें गंदा काम माना जाता है.जिन्हें उनकी जाति और काम के कारण अछूत माना जाता है क्यों न उन्हें भी दूजे काम करने का मौक़ा मिले.यह किस ग्रन्थ में लिखा है कि फला जाति का आदमी आज भी वही काम करेगा.यह बहुत सोचा समझा कदम है.आज आरक्षित वर्ग के कई साथी नौकरी में आने के बाद अपने पूरे परिवार सहित बेहतर जीवन स्तर पर जी रहे हैं.वे तमाम गंदे माने जाने काम छोड़ चुके हैं.जबकि मेरा मानना है कि कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता और अच्छा या गंदा नहीं होता.काम काम होता है.उसे समाज के किसी को तो करना ही होगा.मगर जब काम के साथ जाति जोड़ देते हैं तब तकलीफ है.जोड़ने तक भी कोई बात नहीं उसे उस जाति और काम के कारण ही भेदभाव झेलना पड़े फिर बदलाव ज़रूरी है.वे भी अध्यापक,वकील,डोक्टर,जज बनना चाहते हैं.असल में वे अपने जीने के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं.कभी डॉ अम्बेडकर ने कहा था कि गांवों को जितना जल्दी हो नष्ट हो जाना चाहिए.उनका उस वक़्त सन्दर्भ यही था कि गाँव में जाति आधारित भेदभाव का इतना कुटनीतिक और हथ्याकारक माहौल था और कमोबेश अभी भी है.
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मुझे प्रश्न करने की आदत है।चीजों को अक्सर तर्क पर तौलने की बीमारी है।विवेक आधारित फैसले लेता हूँ।अंधानुकरण से बचता हूँ।नास्तिक हूँ।ज़िंदा आदमी में ही मेरी आस्था है।देश से प्रेम करता हूँ।सर्व धर्म भाव में मेरी आस्था है।धर्मनिरपेक्षता मेरी पसंद का संवैधानिक मूल्य है।जाति और आर्थिक आधार पर आरक्षण का पक्षधर हूँ।मेरी किसी भी राजनितिक पार्टी में किसी तरह की आस्था नहीं है।मैं खुद आरक्षण से आया हूँ.क्योंकि मैं कक्षा बारह तक बिजली नहीं देख पाया.एक ड्रेस में एक साल निकालने का अंदाज़ा है मुझे.गैर बराबरी का दंश झेल रहे गांवों की पैदाईश हूँमैं भी.सदियों तक कुछ विशेष जातियों को दलित घोषित कर दबाया गया है.शूद्रों की दशाएं कभी किसी से छिपी नहीं है.जब उन्होंने इतने बरसों झेला तो तथाकथित उच्च वर्ग को आज़ादी के पैसंठ सालों में ही उल्टियां क्यों रही है.वे थोड़ा तो धीरज धरे.
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एनडीटीवी मेरी पहली और एकमात्र पसन्द है।रवीश कुमार का मैं फॉलोवर हूँ।इस तथ्य के जानने के बाद मुझसे किसी को आपत्ति हो तो मुझे अनफ्रेंड कर सकते हैं।(बाद में जोड़ रहा हूँ जिस दिन रवीश में खोट पैदा हो जाएगी और अगर उस बात से मैं संतुष्ट हो जाउंगा मैं उन्हें भी छोड़ दूंगा.विवेक है मेरे पास.अंधभक्त नहीं हूँ किसी का.पढ़ा लिखा हूँ.)

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