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01 फ़रवरी, 2011

किले में कविता:-अब और हम छुपाएं क्या


महंगाई के ग्राफ में उलझा
ये कमरा नहीं किराए का
यूं ही बिखरी पड़ी रहती है 
पुस्तों की मेहनत खुले में 
आते ही नहीं कोई जौहरी इधर
नासमझ को यहाँ बुलाएं क्या
विलग भाव सनी इमारतें ईठलाती है
अकेले एकदम अकेले,मन ही मन
अनूठा रंग लिए आमुख पर हर बार
मिल जाती है किले में आते जाते
आसपास के सब गूंगे-बहरे
किससे कहे और सुनाएं क्या
जुदा है दुनिया इनकी
गली के नुक्कड़ वाले घर से 
 यहाँ झाडू रोज़ नहीं लगती
न आती है पोछेवाली बाई
न मकान मालिक बड़बड़ाता है
सन्डे वाले सनातन श्लोक
दुःख: फिर भी अपार है इनका 
थोड़े में अब जताएं क्या
कौने-कौने धूल पसरती यहाँ
आँगन बसा है विराना
बच्चों की चिल्ल-पों और दौड़-झपट का
यहाँ न भरता आनंद-मेला
न आते ब्याज के मनके गिनते सेठ इधर 
दूधवाला देता न आवाज़ कभी भर्राकर 
फैंकता न कोई हॉकर अखबार
निशानेबाज़ के माफिक खंडहरों में
सब कुछ तो झोड़ दिया है
अब और हम घटाएं क्या
बिल के माने सांप-चूहों के घर है यहाँ
न बिज़ली,न नल,न केबल तार का झंझट
थोथे चने की मानिंद छनछनाते नहीं
ये महल,रास्ते और दिवारें किले की
जैसा सबकुछ देखा हमने बस्ती में
उलट भांत के रंगों वाली
इस बस्ती की न्यारी बात
बात नफे की एक रही इनके हिस्से
दुःख में हँसने वाले
स्थाई पड़ौसीजात का आदमी
मिला न एक किले में
न दफ्तरी चापलूस बसते यहाँ
जो बेवज़ह हामी भरते हरपल
मौसमी दूकान की तरह बदल जाते हैं
बस्ती में जहां मकान अपने
वैसा आलम यहाँ नहीं
सबकी एक ही ठोर
यूं सबकुछ तो लुटा दिया है
अब और हम छुपाएँ क्या
जो भी मिला सड़क पर 
बाएँ बना हुआ या दाएं खड़ा हुआ
था पूरा का पूरा पथरीला
निपट पुरातन ही पुरातन
नया न कोई ठोर
मेरी आँखों को लगता था
बेईमान अट्टालिकाओं से फकत ऊंचा
किले का स्वाभिमान
यूं शब्दों ने सबकुछ उगल दिया है
अब और हम छुपाएं क्या 

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