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03 फ़रवरी, 2011

किले में कविता:-पूरब का अपना रूतबा था

भले कहानी लम्बी थी
पर वो कहने को आतुर था 
और मैं सुनने को बेताब
एक सुबह की संगत थी जब
वो कहता रहा देर तलक
 और मैं सुनता रहा घंटों
कि
बड़े मान से सूरज उगता था
पूरब का अपना रूतबा था
पहली दस्तक देता शहनाई का सुर
फिर कहीं पुरबिए गाए जाते थे
उसी लाडले पूरब से
अवशिष्ट स्मृतियों की बयार 
आज भी आती-जाती है  
छिटपुट गाँव कुछ फ़ैल गए आकार में 
खेतों की जोत सिमट गई
यहीं बसे हैं कुछ दोस्त मेरे बचपन के
कन्धों पर थामे प्रेमभाव की गठरी
आज भी चढ़ते हैं उसी दिशा से
जहां ईठलाता था आमुख किले का
तना रहता था साभिमान
 जाता रहा वो भी इतिहास के हिस्से
अपने खंडित साथी दरवाजों सहित  
केवल बची है सूरजपोल
पगडंडियों को पूछे कौन
जहां न आती लालबत्तीधारी कारें
यहाँ मिलेंगे आते-जाते खाली
कुछ अन्त्योदय परिवार 
या भूख के मारे ढोर-ढंगर
   मिमियाती बकरियों के बीच प्लास्टिक बिनते 
पाठशाला के अनामांकित-नामांकित बच्चे
हाँ राह बने एक मंदिर में 
लगती है आज भी यहाँ चौकी
भोपाजी,दो हज़ूरिए और कुछ भक्तगण 
यही बचा इस आँगन में 
दर्द कहूं क्या इससे ज्य़ादा  
हाँ पथरीला हूँ मैं, कहने को
मैंने भी दिन देखे हैं
यूंही नहीं ढला मैं
इतिहासी टकसाल के सांचे में  
इन दिनों जब भी देखा पूरब 
हलधर की खेतीबाड़ी में जूते हुए मज़दूर मिले 
 घुटनों तक पानी में फसल सिंचती अबलाएं
और देखी बाजू में 
ज़मीं में धंस रही खानों से पड़ी
गरीब के घर दरारें
कहने को पूरब रह गया बस
बाकी तो सूरज डूबा ही
गीली यादों के पन्ने पलटो तो सही
आज भी लिखा मिलेगा कि
बड़े मान से सूरज उगता था
पूरब का अपना रूतबा था

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