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10 अगस्त, 2011

हमारे आसपास

है हमारे आसपास
देखती और सोचती
पारखी नज़र है ख़ास
है हमारे आसपास

बीहड़ों से शहरों में 
ये जंगलों से रास्ते
गुर्राते और डराते हैं
गांवों के भी वास्ते

मकानों के दराड़ों से
रपटते हुए निकलते
चुलबुलाते बच्चें यहाँ 
डाटती,फटकारती माँएं
है हमारे आसपास 
 पापा देर से घर आवते
तो दुलारती दादियाँ
हैं हमारे आसपास

खेंखारती,डकारती
बार-बार झांकती पर 
देहरी न लांघती
तुलसी और सीता-की सी
हैं बहुएँ आसपास

तार से बिज़ली चोरते
यूं अपनी मस्ती पोड़ते
टोंटियों से जल ढोरते
आदमी हर जात के
हैं हमारे आसपास

कुछ धुनपके लोग
आँगन तुलसी रोपते
सूरज हित जल छोड़ते
दिन उगे सब जापते
नापते न तौलते सब
अब उलफैल बोलते
सब ही अब आम हैं
बचा न कोई ख़ास
है  हमारे आसपास

कुछ नमाजी आज भी
संग चौंतरे पर बैठते
वो न एंठते न चेंठते
यूं मस्तमौला भाईचारा
सरकाता है पासपास
ऐसी दुनिया ऐसा आलम
है हमारे आसपास

मुस्कान चिपटाए होंठ सहित
देर तक खड़े रहे हम 
अपनी मुंडेर
आँख ईशाराते वे खड़े 
दूजी मुंडेर
न वो हिले तनिक 
न हम डुले
अब ऐंठ उग आई ऐसी
है हमारे आसपास










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