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22 जनवरी, 2012

22-01-12

दिनभर से सीने में दर्द था.कभी कम कभी ज्यादा.मगर किसी को कहा नहीं.सोचता रहा, दर्द ज्यादा हो जाये तो बाद में कैसे कैसे हालात संभव हो सकते थे,उनके बारे में मन में चिंतन जारी रहा. बड़े दिनों के बाद समय निकाल कर किले में कुछ पल गुजारे.विचार-मंथन के बीच बाईक पर लगातार.हाँ अब मौसम में कुछ गरमी आ बैठी थी. मगर सुबह और शाम का वक्त तो शहर में सर्दी के ही डेरे लगे रहे अनुभव हुए..रात के खाने के ठीक बाद पत्नी को दिन के दर्द के बारे में क्या कहा...फिर क्या उसकी जल्दबाजी के चलते दसवें मिनट में तो हम.डाक्टर साहेब के सामने थे.... अस्पताल ले जाने तक वो मुझसे दस बातें सोचती कहती रही. मिलने वाले डोक्टर साहेब ने रविवार होने के बावजूद देखा,ये हम पर बड़ा अहसान किया.

बी.पी.नापा,सीने और पीठ में कुछ नाप-चोक लिया,वही हमेशा की तरह के दो-तीन सवाल दागे .......कोई भारी वज़न तो नहीं उठाया ?....दर्द तेज़ है या ठीक-ठाक ?....घी कितना खाते हो?......मसलन.....खाया हुआ घी पचाया भी करो.......खांसी तो नहीं हुई ?.....ये लो....डाक्टर साहेब बोले ...चिंता की बात नहीं है ये दर्द सीने में जिस तरफ है हार्ट नामक मशीन दूजी तरफ है.नॉरमल दर्द है. ....घी खाना बंद कर दो.मैंने भी अपनी चालीस की उम्र में पिछले बीस सालों से नहीं खाया है.............

तब समझ में आया कि सर्दी की घी मिश्रित दवाई के लड्डू खाने वाला मैं पैदल चलने के नाम पर जीरो किलो मीटर चलता हूँ. तो परेशानी होना वाजीब ही तो थी.मैंने अपना मन बदला,दूजे दिन से कुछ ज़रूरी काम पैदल निबटाने का मानस पक्का किया.डाकटर साहेब के घर के बाहर ही लगे व्यवस्थित मेडिकल से रोजाना की दो गोली के हिसाब से छ; गोली भरे पेट लेने की हिदायत सहित खरीदी.विक्रेता ने एक थैली मुफ्त दे मारी.और ओ और साथ ही फांद दी पांच ऐसी गोलियां जो भूखे पेट लेनी थी.एक ट्यूब जो दर्द वाली जगह पर लगानी थी.बिल  बना एक सौ पिच्यासी.....फीस सहित ये दर्द का इलाज दो सौ पिच्यासे में पडा.मतलब आप समझ गए होंगे दोकात्र साहेब ने अहसान के साथ ही फीस भी ली.

यूं दर्द वर्द की कहानी तो यहीं ख़तम हो गयी.पत्नी की चिंताएं भी समय के साथ पानी के घड़े में कचरे के नीचे बैठने की तरह बैठ गयी.मगर मेरे मन में कई अलग तरह के विचार उग आए.........भला है उन लोगों का जीवन कैसे चलता होगा(गरीब और पिछड़े तबके के लोग)...जिन्हें खाने/चोपड़ने को घी नहीं मिल पाता.ऊपर से रोज़  मज़बूरीवस पसीना बहाना पड़ता है वो भी बिना किसी डाक्टर की सलाह के ..अगर उन्हें भी मेरे जगह रखकर देखूं तो भूखे पेट वाली गोलियां तो उन्हें कभी भी दी जा सकती है....मगर उनकी चिंता तो भरे पेट वाली गोलियों को लेकर शुरू होती होगी..गोलियां कैसे लेंगे जब पेट भी कभी कभार भर पाता है.....क्या वो दर्द वाली मरहम लगाने से उनके दर्द दूर हो पाएँगे.जो उनके ग्राम सरपंच,सचिव,पटवारी,नरस बेंजी और गाँव के उठाईगीरे छोकरों के कारण नित नए रूप में उपज रहे दर्द से क्या उन्हें निजात दिला पाएगी.उनका सीना रोज़ दर्द के मारे कराहता है मगर उनकी बस्ती के पास हमारे मिलने वाले जैसे डाक्टर साहेब नहीं रहते.रहते भी तो रविवार को मरीज़ नहीं देखते.मरीज़ देख लेते तो उन गरीब साथियों के पास फीस के सौ रूपए नहीं होते जो हमने भी बड़ी मुश्किल से चुकाए.जिया जलता रहा मगर क्या करें. कुछ पेशे ऐसे होते हैं जहां हमारी नहीं चलती.

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