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11 फ़रवरी, 2012

11-02-2012

आज का दिन भी ठीक कल की तरह था.स्कूल की नौकरी में रोज़ाना उन्हीं बच्चों से सामना,वही रास्ता,जिस पर खेती किसानी में डटे हुए किसान,धुनियों पर हाथ सेकते गाँव के लोग,तालाब पर नहाते बच्चे,सरसों और अफीम के खेत,कच्चे रास्ते पर ढुलता हुआ पानी,दो घंटियों के बीच पूरी होती दिनभर की ड्यूटी.यही सारी घटनाएं घटित हुई आज भी.दूसरी और अपनी रूचि के दूजे काम में आकाशवाणी हेतु शाम के समय दूर के मित्र कालू लाल कुलमी की हिन्दी वार्ता रिकोर्ड करना हुआ.केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में सामाजिक यथार्थ जैसे विषय पर.वार्ता में यथार्थ बयानते बहुत से बिंदु रेडियो की अपनी सीमाओं के चलते मुझे काटने पड़े.कालू भैया के लिए ये नया अनुभव था,लगभग ठीक उच्चारण और हड़बड़ाहट में बहुत देर तक मुझे वार्ता में सम्पादन कार्य करना पडा.यही फरक होता है थोड़ा व्यावसायिक अंदाज़ के बुज़ुर्ग लेखकों और थोड़े से चले मगर रफ़्तार नापते इन युवाओं में.खैर युवा कालू लाल कुलमी के तेवर और लेखन बहुत आगे तक जाएगा ऐसा मेरा सोचना है.

तीसरे दृश्य में रेडियो के कुछ मित्रों गोया अब्दुल सत्तार,देवेन्द्र पालीवाल,भगवती लाल सालवी,दीपेश भटनागर,अमित चेचाणी,नन्द किशोर विजयवर्गीय के साथ दूजे रेडियो मित्र ईश्वरचंद मेनारिया के भतीजे की शादी में बीस किलोमीटर सुवानियागाँव में जीमने जाने का सफ़र था.रास्ते भर हम सभी रेडियो की बातें उगल रहे थे.जी भर कर बोलने पर तुले हुए थे.बिना किसी लागलपेट के..रास्ते में छपे/लगे दिशासूचक बोर्ड का आनंद लेते हुए राहगीरों से बतियाते चले जा रहे थे.जहां गाँव के नाम के आगे की दिशा नहीं छपी थी.सही पता बताते वे गाँव के सीधे लोग भा रहे थे.जीमने के नोरे के ठीक बाहर अपनी कविताओं की दो डायरिया मैंने पास के ही बकरी पालन करते परिवार के घर रखी.हम भोजन करने चले,यहाँ मुझे अपनी उन अमूल्य पांडुलिपियों के दीगर दुरुपयोग का कोई खतरा नहीं था.पहली बार मेरी कवितायें उन लोगों के घर चार घंटे रही जिनके हित मैंने अपनी कविताओं में बहुत अधिक लिखा था.पहले कभी हमारे अधिकारी रहे सीताराम महावर जी का एकदम विलग अंदाज़ भा गया.बेहद स्नेहिल.एक अधिकारी और बड़े भाई के व्यवहार में जो फरक होता है वही महसूसा.स्टेज पर वरमाला के टोटके को किसी हिन्दी फिलम की तरह देखते वे झोंपड़ियों के लोग मुझे एक बड़ा अचरज दे गए.तेज़ सर्द हवाओं के बीच रात के वक्त घर लोटना.थकान के होते तय समय से पहले पोड़ना.ज़रूरी रिपोर्टिंग करते हुए पत्नी को यात्रा के अनुभव सुनना,बस यही कुछ था आज के खाते में 

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