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04 अगस्त, 2012

'प्रेम' विषयक क्षणिकाएं

'प्रेम' विषयक क्षणिकाएं

(1)
दिखी
मिली
चहकी
बहकी
झुकी
रुकी
आखिर
चल दी
हाथों में
धर के
प्रेम
शबद

(2)
उसके
इतराने का
आधार
मैं
कब बन गया ?
सहेलियों की चर्चा
का केंद्र
कुछ पता नहीं
मैं कब हो गया
किसी का
'प्रेम'

(3)
न खत लिखा
न छत गया
गया नहीं मैं
पनघट कभी
न तका कभी
मुंडेर से 
न झांका
कभी 
खिड़कियों से
पडौस में कहीं
न अटका
न भटका 
मगर 'प्रेम' 
पलता रहा चुपचाप
बगैर बताये उसे
उम्र में ढलता रहा
(4)
कोलाहल ख़त्म होते ही
एकांत में देख मुझे
आ घेरती
उसकी स्मृतियाँ

चहकती मुद्राओं का
एक चेहरा
अपना सा रंग लीप देता
मेरे आमुख पर

कान में फुसफुसाते
एक जोड़ी होंठ के साथ
गुदगुली चलाते हैं
गरदन तक आते
उसके कुछ शरारती केश

भूलने की इस उम्र में भी
कितना कुछ 
ज़रूरी काम के मानिंद 
याद आ जाता है
मुझे
'प्रेम' में आज

(फ्रेंडशिप डे की शुभकामनाओं के साथ )

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