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01 फ़रवरी, 2013

01-02-2013

आज मैं जिस रोमांच से भरा हुआ हूँ।कह नहीं सकता।आज आत बस स्वयं प्रकाश की  रंगमंचीय अदाकारी भरे कौशल के साथ सोना चाहता हूँ।उनके कथाकार वाले रूप से परिचित सभी पाठकों से मेरी हाथाजोड़ी है कि जब भी सम्भव हो उनके प्रगतिशील गीत ज़रूर सुने। 'हम बंजारे','भारत दुर्दशा','मेरा परिचय' जैसी रचनाएं।आप सुनने के बाद सच में किसी और दुनिया में होंगे।मैं कोशिश करूंगा कि शीघ्र अपनी माटी के ज़रिये आपके बीच कुछ रिकोर्डिंग साझा कर सकूँ।सच तो यह है कि आज जिंक नगर में आमंत्रित  श्रोताओं के बीच स्वयं प्रकाश जी को हम सुनने गए।वहीं कोलोनी में हाल आये युवा दोस्त विपुल शुक्ला के प्रगतिशील कविता ने मेरा दिल जीत लिया।नगर के गीतकार रमेश शर्मा ने अपना नया गीत पढ़कर फिर मेरे रुचिकर गीतकार साबित होने में सफलता हासिल की।इस आयोजन के लिए जिंक के साथियों सहित जे पी दशोरा भैया,मुकेश मूंदड़ा,जी एन एस चौहान का शुक्रिया अदा करता हूँ।आयोजन में कनक भैया, राजेन्द्र सिंघवी जी और राजेश चौधरी जी साथ थे अनुष्का भी रात दस बजे तक मेरे साथ रही।उस चार साल की उम्र में ही स्कूल से ज्यादा आयोजन रुचने लगे हैं।

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