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11 जून, 2013

11-06-2013

स्वामी विवेकानंद ने पक्के नास्तिक होते हुए भी ध्रुपद और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन सीखा।रियाज किया गाया।यहाँ तक कि उनके गायन से ही ज्यादा प्रभावित हो स्वामी और ठाकुर रामकृष्ण परमहंस ने उनसे लम्बी चर्चाएँ की।शिष्य बनाया।आगे बढ़ाया।अपना उत्तदायित्व सौंपा।चर्चाओं के बीच वे विविकानंद से गायन सुना करते थे।उन्हें बंगाली रचनाएं बेहद पसंद थी।ये विचार और स्वामी विवेकानंद की पसंद के गीत सुनने का मौक़ा पंडित अजय चक्रवर्ती जी से मिला।
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'ससुराल से बड़ाकोई स्वर्गनहीं हैऔर अगरससुराल भोपालमें होतो क्याकहने' एक से बढ़कर एक ठाठ।सास-ससुर,साले और साले की बीवी सब सेवा में हाजिर।रोज नए किस्म की डिश।कुछ मित्र कह रहे थे कुछ साल पहले तक आपने बताया आपका ससुराल इंदौर है।उससे पहले एक सज्जन ने कहा आप बता रहे थे कि आपकी बीवी जावद(मध्य प्रदेश) की है।आपने शुरू में कहा था कि आपने शादी अपने ही गाँव अरनोदा में की थी जहां आपके काक्या ससुर रहा करते थे।

आखिर कल एक मित्र ने पूछा क्या, ''आपने दूसरी शादी या फ़िर………………।''

भाई मैंने शादी एक ही बार की है अब मेरा साला अपने जॉब के चक्कर में शहर बदले तो इसमें मेरा क्या कसूर।इस प्रयोग और वाकिये से निष्कर्षत: हम सभी कह सकेंगे कि शहर बदल जाने से भी ससुराल वही रहता है।साला वही रहता है।पत्नी वही रहती है।सास-ससुर वो-के-वो।खातिरदारी का अंदाज तक नहीं बदलता।(नोट:-आपके लख्खण के हिसाब से खातिरदारी का अंदाज परिवर्तित हो सकेगा।शर्ते लागू।)
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एक ख्वाहिश पूरीहोने कीतरह फिरअपने चित्तौड़में गया हूँ।इतरमित्रों केसाथ कलकत्तायात्रा केबाद अपनेअभिन्न मित्र(बेटर हाफनंदिनी )केसाथ कीयात्रा मेंअनुभव कियेअंतर केसाथ जानेकितने रेलवेस्टेशनों सेगुज़री रेलगाड़ी आखिरआज सुबहढ़ाई बजेचित्तौड़ टेशनपर आई।अनुभवबड़े गज़बहै।रेलवे स्टेशनसे होटलतक जानेके एकसवारी दसरुपये मगरवापसी मेंहोटल सेटेशन तकजाने केपचास रुपयेप्रति जवान।

मथुरातो बापरे बाप।इतनेसारे मंदिरऔर आश्रमकि घरजैसी चीजतो दिखनानामुमकिन है।सभी'दुकाने' हैं।सारेमंदिरों केखुलने बंदहोने कीसमय सारणीबनाके चलोतो भीदर्शन होजाए संभावना कम है।दर्शनहो जायेतो पंडोंके गोचोसे बचजाओ असंभवहै।यू पी  और बिजली में छत्तीसका आंकड़ा।पीनेका पानीमतलब बिसलरीही होताहै।यमुना कीहालत सभीजगह एकसी हीथी।चाहे आगराजाओ यामथुरा,वृन्दावन।कुछदेर हमभी यमुनाका दुःखपूछ आये।

लूट-पाट केमामले मेंबंदरों तककी सेटिंग।बन्दरआयेगा आपकापर्स याचस्मा झपटले जाएगा।फिरआपके परेशानचहरे केसामने एकबच्चा आयेगा,कहेगा पर्सया चस्मावापस लानेका मैंही रामबाणइलाज हूँ इधर उधर देखने से कोई फायदा नहीं है।ले-दे-केपचास केनोट परएक दसकी फ्रूटीदेकर बच्चाबन्दर सेबदले मेंपर्स लाआपको सोंपेंगा।इस माजरे में सबकेमजे हैं।चालीसकी गोचरीमें खुश उस बच्चे की कहे या।दस कीफ्रूटी पीनेमें मस्त बन्दर की सोचे।आठ कीफ्रूटी दसमें बेचनेमें प्रसन्नमुखा दुकानदार या फिर पचास केबदले सातसौ काचस्मा हथियाने से खिले चहरे वाले आप खुद।बोलो राधे-राधे।
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धूपिली राहों बीच वैष्णोदेवी ट्यूरपूरा हुआ।जीवनमें एकबार हीकरने योग्यमथुरा,वृन्दावनभी निपटगया।एक शामभारत भवनमें पंडितअजय चक्रवर्तीजी का गायनसुनने मेंबीती। हालांकि कुछ दिन पहले ही कलकत्ता अधिवेशन में पंडित जी को सुन चुका था। मगर मन नहीं भरा।असल में मुझे पंडित को देखने में नहीं सुनने में रूचि है।देखना होता तो दुबारा भारत भवन नहीं जाता।फोन पर पता लगा उस आयोजन में संचालनवरिष्ठ साथीऔर समीक्षकविनय उपाध्याय करने वाले हैं।लगे हाथ उनसे मिलने का उमाव मेरे मन हमेशा रहता ही है।हालांकि कार्यक्रम में अंतिम रचना के शुरू होने से ठीक पहले ही निकलने केकारण उनसे (विनय भैया और प्रेमशंकर जी )मिल नहींसका।बाकी बड़े लोगों से मिलने में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं रही।मैं उसी से मिलता हूँ या नमस्ते ठोकता हूँ जो कम से कम मुझे जानता तो हो।या जानेगा इस बात की कुछ संभावना हो।गोया नेता नगरी के आने पर कुर्सी छोड़ ताड़ासन करना या दंडवत करना मेरी फितरत में नहीं।माफ़ करना।

इस यात्रा में एक अफसोस ज़रूर रहा।कथाकारस्वयं प्रकाशजी केशहर भोपालमें उनसेमिले बगैर मैं गोञ्चॊ चित्तौड़ निकल आया।हालांकि वे मुझे पह्चानेट ज़रूरी नहीं मगर मुझे उनका लेखन बेहद पसंद है ये शर्त ही काफी है उनसे मिलें के लिए।पूरीयात्रा मेंभोपाल रास आने वाले शहरों में नंबर वन पर रहा।दिल थाकि वहाँ  होरहे नाट्यरूपमहोत्सव केनाटक देखता।मानवसंग्रहालय में आदिवासियों पर केन्द्रितफिल्म महोत्सवदेखता।एक अनिच्छा के साथ एक रवानगी।एकअफसोस साथीअशोक जमनानी के घरहोशंगाबाद नहीं जाने का भीशामिल समझिएगा।मनहै कि भोपाल प्रवास के दौरान कभी स्वयंप्रकाश जी,राजेश जोशीजी राजेन्द्रशर्मा जी,विनय भैयासे बातोंमें वक़्त गुज़रे।
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घर से बाहर और फिर शहर से दूर की यात्राओं के बीच अपना शहर बड़ा याद आता है।एक अतीत की तरह यात्राओं के दृश्यों के बीच भी नॉस्टेलजिक होने की मंशा रहती है।पूरी होती यात्रा में अधूरे पड़े काम याद आते हैं।एक सीन को कैमरे में कैद करते वक़्त बीते समय के सीन याद आ पड़ते हैं।रुका हुआ परीक्षा परिणाम, आने वाली परीक्षा की तारीखे, अखबार, दूधवाले का माहवारी हिसाब याद आता है।बिजली का मासिक बिल और नल के मीटर के यूनिट नज़र आने लगते हैं।ट्रेन की गर्मी के रेले के बीच घर की ठंडक याद आती है।बिसलरी पानी घुटकते वक़्त घर की छुकली का शीतक जल गले में बैठ जाता है।होटलों के सुगले लेट-बाथ के बरक्स अपना आँगन याद आता है।एक मध्यमवर्गीय नौकरीशुदा आदमी को इससे ज्यादा क्या याद आयेगा।अन्तोगत्वा सारांशत: यात्राएं जीवन में ज़रूरी पड़ाव की तरह शामिल की जानी चाहिए।

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