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12 जून, 2013

12-06-2013

एक कवि अपने जीवन में लिखी तमाम कविताओं में से एक संतोषजनक लम्बी कविता की रिकोर्डिंग के लिए तैयार है।एक बेटी लिखने,सुनने और बतियाने का सलीका सीखती हुयी अपने पिता के साथ एक शिष्या की तरह हमसफ़र है।उम्र में छोटे मगर पर्याप्त समझ और गहरी चर्चाओं के शौक़ीन एक अधिकारी एक शाम सृजक की भूमिका में एक विद्वान से मिलता हुआ दिख रहा है।एक अनुज प्रशिक्षु की मुद्रा में देर तक विनम्रता से खड़े हुए काम निबटाता हुआ।एक युवा अपने काम की बढ़ाई सुनने के बाद भी सहज होने की शक्ल लिए बैठा है।असली तरीके से 'संगत' का आलम बिखेरती एक शाम को कौन नहीं वरना चाहेगा।स्त्री विमर्श को केंद्र में रख लिखी गयी 'सीता की अग्नि परिक्षा' की रिकोर्डिंग पूरी होते ही एक चर्चा की आमद होती है।उपस्थित जन का उसमें बह जाना लाजमी है।कुछ कम समझदारों से और क्या आशा? विज्ञान के लोगों का साहित्य में गूंथे हुए रूप में दिखना एक उदाहरण और वहीं इसके उलट उदाहरण भी।

अफसोस ये भी कि अपने से बड़ों के खड़े रहते कुर्सियों में धंसे रहने की ढीटता ओढ़े कुछ जनाब चुपचाप उंघते रहे।एक हद तक जाती सादगी खुद में लिए युवा विचारक का अपनी अनुजा शोधार्थी के लिए कुर्सी ऑफर करना।एक वरिष्ठ साथी के लिए दूसरी तरफ अनजाने बने रहने का भाव।खैर जीवन में कड़वे अनुभव ही तो सीखाने की मुद्रा में आते हैं ना।खुद को लीन दिखा एक नाटक के पात्र बनते हुए कुछ नासमझ साथी और घड़ी का काँटा आगे खिसकता हुआ।तयशुदा प्रोग्राम के अनुसार आतिथ्य सत्कार के साथ ही मौसम का आनंद लेता एक अदद इंसान।बारिश में भीगते एक शहर के ये तमाम लोग एक ही समाज के हैं।मगर ऊपर लिखे विवरण में शामिल सभी लोग अलग-अलग रुतबे से आते हैं।उनकी तालीम के ठिकाने निश्चित रूप से अलग ही रहे होंगे।मगर सारी विविधताओं के बावजूद जो समानता ये समाज चाहता है उसके हित सभी कहाँ फिट बैठते हैं।

एक यादगिरी और कुछ अफसोस के साथ एक शाम डॉ सत्यनारायण व्यास, रेणु दीदी,योगेश कानवा जी,अफसाना बानो,स्नेहा शर्मा,पूरण रंगास्वामी,भावना शर्मा,जयंत पुरबिया जी के साथ बीत गयी।

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