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06 अगस्त, 2013

06-08-2013

सावन है। बारिश है। हरियाली उफान पर है। तितलियाँ हैं। सपने हैं। उमंग से भरा मन है।पत्तियों पर इकठ्ठा पानी धीरे-धीरे टपकाते पेड़ हैं। एक छोटा वास्तविक परिवार और साथ है एक बड़ा आभासी परिवार। इधर रमजान है और  गली के मौड़ पर जलेबी वाले का ठेला है जहां शाम के वक़्त सभी चचाजान अपने रोजेदार कुनबे के लिए जलेबी पैक कराते नज़र आते हैं। मैं कुछ देर के लिए अपना जलेबी ऑर्डर पीछे सरका देता हूँ और इस तरह भाईजान के रोजे में शामिल हो जाता हूँ। इस नाचीज ने  अपने गुरूघंटालों से दिन को घर बैठे हरियाला बनाने की कई तरकीबें सीखी हैं। आखिर कब काम आती। संगीत के साथ की संगत में कजरियाँ-ठुमरियाँ लेकर बैठा हूँ । ज़माने की मशहूर विदुषी गायिकाओं के रिकोर्ड पास रख्खे हैं। बनारसी मस्ती के सरताज उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की यादों के साथ कान में पड़ती उनकी शहनाई पर बजाई कई रचनाएं हैं। ठुमरी रानी गिरिजा देवी जी के हित इस कठीन समय में दिल में उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना है और सुन रहा हूँ उनका गाया बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए। जाने वे कौनसे नैहर की बात करती है और मन विचलित हो उठता है। आगे के घंटों के लिए शुभा मुदगल की उपशास्त्रीय रचनाएं हैं और तो और शोभा गुर्टू जैसी दिलकश आवाज़ भी आज के लिए क्यू कर रख्खी है। इतना ही विवेक पाया है काट-छाँट कर सुनने का मैंने। 

घर बैठे इस ठाले पास आज कोई काम ऐसा नहीं जिसे नौकरी की श्रेणी में गिना जाए। जिससे पगार मिलती हों। जिसके हित काम के घंटे नियत हो। जिसमें एक हाकम हो और थोड़ा से आदेशनुमा सुभाषित हों। एकदम मस्त फ़कीर की-सी अनुभूति से लबरेज है ये बन्दा। इन सब पर भारी गले में परसों के बाद की बची हुई थोड़ी सी खरांस है। मूँह में आधे रास्ते तक ठीक हुए चार-पाँच छाले हैं। याददास्त काम करने लगी तो याद आया शाम की दूजी व्यस्तता के नाते सुबह से एक काम अपने अधूरेपन के साथ मुझे कब से ताक रहा है। एक प्रस्तुति है जिसे आख़िरी शक्ल देना बाकी है। आने वाले दिनों के हित कुछ उपहारनुमा आयोजन तय करने शेष हैं। खैर 

इस कम फुरसतभरे वक़्त में ये भी घट रहा है कि एक बिटियाँ अपना जन्मदिन छ: के बजाय सात को मनाने पर राजी हो गयी है। एक बार सोचा तो लगा कि बर्थ डे मतलब। केक हो, दीये वाली मोमबत्ती हो। अड़ोसी-पड़ोसी के अगर छोटी साइज के बच्चे हों तो वे आ जाए, नाचे-गाएं और हो सके तो गिफ्ट-फिफ्ट के चक्कर में ना आएँ। आजकल के फ़िल्मी गीतों पर थोड़ी सी फुदक-फुदक हो जाए और क्या निचौड़ निकलेगा इन आयोजनों से भला। ये माहौल लगभग महीने भर पहले से घर को गीला कर देता है। बच्चों के साथ मात-पिता के दिमाग में भी मीनू-सीनू सहित काम के और बेकाम के लोगों की सूचियाँ बनती-बिगड़ती है। आँखों के सामने बजट और बच्चे बारी बारी से आकर असमंजस्य में डालते हैं। वैसे रिश्तों के बीच बार-बार की मूँह फुलाऊ रस्मों के इस दौर में यही तो मौके हैं जब हम अपने छातीकुटे भूल के खिलखिला सकते हैं। आखिर में तय किया कि तो बर्थ डे मनाने में हर्ज़ क्या है ?

वैसे खिलखिलाने का एक मौक़ा आज हाथ से रिपसता नज़र आ रहा है। मित्रों के साथ की एक तयशुदा यात्रा से हम महरूम रहेंगे।  किसी के  बगैर रहना कितना मुश्किल काम है दिल जान रहा है ये दर्द आज। इस बात की कमी पूरना असंभव है मगर मैं इस औपचारिक संगीतसभा से अपने नुकसान की भरपाई में सुबह से लगा हूँ।असल में मेवाड़ में हरियाली अमावस को एक त्योंहार के माफिक बरता जाता है। चित्तौड़ के किले पर आज ही के दिन जिले के सारे गाँव वाले कब्जा जमा के मेले का-सा चित्र खींचेंगे। सारे पिकनिक स्पॉट एकदम हाउसफुल । बेतरतीब पार्किंग और लापरवाही की हद तक ड्राईविंग के सारे नमूने आज सड़कों पर दिखेंगे। दारू की बोतलों के हजारों ढ़क्कन आज अपनी मोहतरमा की तरह साथ रही बोतलों से जुदा हो जायेंगे। दुर्ग चित्तौड़ पर फोटो क्लिक करने के बहाने शाम तक तो हजारों पर्यटक फोटोग्राफरों के साथ मिलकर विजय स्तम्भ को हाथ के नीचे आया छाप चुके होंगे।किले की कई तस्वीरें हजारों झोपड़ों में पहुँच चुकी होंगी।बेचारे महाराणा कुम्भा ने कहाँ सोचा होगा कि विजय के इस थम्ब पर जाने कौन-कौन अपना हक जमाएँगे।

मौसम के यही सारे हरियाले रंग आपको भी मुबारक जिनमें किसी जात-बिरादरी और घर्म की बू नहीं आती। जिनमें झगड़ों की गुंजाईश न के बराबर होती है। जिनमें उलझन कम संवाद ज्यादा हो सकता है। प्रकृति के इसी आँगन में हर भांत का आदमी बैठकर चौपड़ खेल सकता है। हर विचारधारा की वकालत करता एक्टिविस्ट टाइप का हर आदमी इस मंच पर बैठकर अपने तर्कों से राय प्रकट कर सकता है। इसी हरियाली धरती की गोद में लेटकर इतनी बुद्धि तो कमाई ही जा सकती है कि हम दूजी विचारधारा के आदमी को आदमी ही समझें।उससे से बात करें-मुस्कराएँ और हो सके तो उसके तर्कों को सुनकर उसके माकूल जवाब दें। बातचीत तो एक ही जाजम पर होगी ना। जाने क्यों अरसे से ये शिविर अपनी ही बिछाई जाजम से बोल रहे हैं।न दूजा सुनता है न जवाब देता है। बंधन और सिद्धांत ढील रहे हैं। जाजम के पञ्च भी ढीले पड़ते देखे गए हैं। फिर ये अपनी-अपनी रागदारी कब तक?

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