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17 अगस्त, 2013

17-08-2013

कई हाथों में इस बार 
होक वाली चांदी या भोडर की राखियाँ
बंधी दिखेगी तुम्हे

रुँधे गले से रोएँगे 
बहुत से जवान अंगोछे से पौंछकर आँसू बार-बार
लौटे जो नहीं है घरों को
महीनों से गायब
बुजुर्ग आदमी कई सारे
और कई उम्रदराज औरतें
उत्तराखंड त्रासदी के बाद

(हाल की लिखी एक मार्मिक कविता का अंश )

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