अभी ज़िंदा हूँ कुछ दिन ---------- सभी बोल रहे हैं सभी छप रहे हैं लिख रहे हैं सभी आजकल चारों तरफ आवाजें हैं बोल...
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25 मार्च, 2018
13 अगस्त, 2014
'शोध दिशा' के फेसबुक कविता विशेषांक में छपी कवितायेँ
आदिवासी ये सातवें दिन के हाट भी गज़ब हैं हाँ इकलौते बड़े ज़रिये हैं मिलने-मिलाने गीत गाते दुःख बिसराने के रोचक साधन हैं खिलखि...
05 जनवरी, 2014
05-01-2014
कविता, कवि ह्रदय आदमी के ज़िंदा होने का प्रमाण है जिसमें वह अपने होने के सबूत के साथ जीवन के अनुभवों को बारीकी से देखते हुए समाज के मद्देनज़र ...
17 अगस्त, 2013
17-08-2013
कई हाथों में इस बार होक वाली चांदी या भोडर की राखियाँ बंधी दिखेगी तुम्हे रुँधे गले से रोएँगे बहुत से जवान अंगोछे से पौंछकर आँसू बार-बार लौ...
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