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20 अगस्त, 2013

20-08-2013

आज 'राखी' है,छोटी बहन सौ किलो मीटर दूर है,कह रही थी नयी शॉप खोली है अभी सीजन है आप ही आ जाओ इस बार .इधर पीठ में कहीं रीड की हड्डी होती है उसमें दो दिन से दर्द है.अर्धांगिनी भी अपने पीहर नहीं जा पाई क्योंकि मेरा ससुराल भोपाल जाने कितने किलोमीटर दूर है.जिसे मैं अपने सालाना फेरे में भी नहीं नाप पाया।वैसे मेरा साला भी अपने घर के बजाय अपने ससुराल इंदौर गया हुआ है.दिन केवल आज का है.अब गाँव जाने के बहुप्रतीक्षित फैसले को अंजाम देना है। वहाँ माँ है जो अब भी इस उम्र में अपने पीहर जाकर राखी बाँधना चाहती है मगर हम नालायक उन्हें फ्री नहीं करते हैं.वो गाँव में पिताजी की सेवा में हैं.हम यहाँ शहर में एक दूजे की सेवा में तल्लीन।खैर। अनुष्का एक राखी लेकर घूम रही है सोच में है कि किसे बाँधू।सब गड़बड़ है.राखी का तो पता नहीं मगर हम गाँव जाकर आज अपने माँ -पिताजी को यहाँ हाल का डाला गया नया अचार, युगल सहयोग से बनायी बेसन चक्की, मरम्मत के बाद का गैस चूल्हा, पिताजी के पसंद वाली चाय का एक किलो वाला पैकेट दे आयेंगे। 'हैप्पी रक्षाबंधन' के नारों के बीच मुझे उन अनजान परिवारों के प्रति पूरी सहानुभूति है जिनके घरों से किसी का भाई और किसी का बहिने उत्तराखंड त्रासदी में बिछड़ गए.

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