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14 जनवरी, 2014

14-01-2014

चित्रांकन-अमित कल्ला,जयपुर 
  • अंगरेजी नौकरी की भाषा है और हिन्दी हमारी संपर्क भाषा है (जब नौकरी नहीं कर रहे हो तो उस वक़्त में अपनों से संपर्क हिन्दी में करो) हिन्दी ही दिखेगी तो विचार भी हिन्दी में आयेंगे और हिन्दी में ही अपनी बात को कहने की इच्छा होगी ऐसे में भारतवासियों का फेसबुक आदि या फिर बोलचाल के मंचों पर अंगरेजी चपेकना कितना भद्दा लगता है इन्हें हिन्दी लिखना सीखा दो रे भाई ताकि आँखों में छाया ये भद्दापन तो मिटेंजिन्हें विश्व बाज़ार के मद्देनज़र लिखना है वे लिखें अंगरेजी मेंजो हिन्दी नहीं जानते हैं उनका कुछ नहीं हो सकता हैअंगरेजी मेरे लिए एक भाषा है और हिन्दी मेरा स्वाभिमान है।इसे मेरी कट्टरता समझने की भूल मत करिएगा।अगर मैं कट्टर होता तो अंगरेजी साहित्य के साथ बेचलर डिग्री पूरी नहीं करता।यह राष्ट्रीय गौरव का विषय है महज भाषा का मसला नहींअंगरेजी मुझे भी आती है और मैं अंगरेजी से नफ़रत भी नहीं करता हूँ, बात सिर्फ तरजीह की है जो मैं हिन्दी को देता हूँ भाषाएँ सीखने में एक भी बुरी नहीं है ,न सीखने में कोई बुराई हैहिन्दी बोलना-लिखना हमारी संस्कृति का हिस्सा हैसंस्कृति कभी खोती नहीं है हमेशा अपने आप को संवर्धित और साफ़ करती रहती है,इसके नित-नूतन स्वरूप को ही संस्कृति का सही बहाव कहते हैंसंस्कृति के लम्बे वक़्त तक ज़िंदा रहने का मूल मंत्र ही इसकी सामंजस्य बिठाने की वृति हैजो राह में कड़क और अड़ाक की तरह बरताव करती हैं वे गर्भ में चली जाती हैंसंस्कृति तभी प्रगतिशील कही जाएगी जब उसमें आस पड़ौस से आने वाली संस्कृतियों के साथ मेलजोल करके हम एक समावेशी रूप तैयार करते चलेहमारी ये भारतीय संस्कृति भी एक समावेशी संस्कृति हैकिसी एक तरह की संस्कृति का ठेकेदार इसे नहीं कहना चाहिएइसमें बहुतेरी संस्कृतियों का प्रभाव हैयही सही हिंदुस्तानियत का एक पक्ष भी है। वक़्त के साथ आगे बढ़ते रहना चाहिए हम संस्कृत,से पालि,प्राकृत,अपभ्रंश होते हुए आज सोलाह बोलियों से लबरेज हिन्दी तक आ पहुंचे हैं। जो जन साधारण के लिए सुविधाजनक हो उसी भाषा का उपयोग किया जाना चाहिए क्योंकि यही हमारी संस्कृति को तरजीह देना है। अंग्रेज मित्र हैं तो उन्हें अंगरेजी में बतियाओ कौन रोकता है। रही बात फेसबुक के भारत में उपयोग की तो भाई फेसबुक को बाज़ार चाहिए उसे भाषा के मुद्दे से कोई फरक नहीं पड़ता है।उसने तमाम भारतीय भाषा के उपकरण भी फेसबुक में बना दिए हैं कुछ सोच करके बनाएं होंगे वो चाहते तो केवल अंगरेजी के ही टूल बना देते। मेरे दोस्त मैंने पहले ही कहा है कि अंगरेजी बाज़ार की भाषा हैजब आपको लगता है आप उपभोक्ता हैं अंगरेजी में बतियाएं बाकी हिन्दी भी कोई बुरी नहीं है साथी(अच्छा हुआ मेरा कोई दोस्त अंग्रेज नहीं है नहीं तो उसे पहले हिन्दी सीखाता फिर पढ़वाता)दैनंदिन जीवन में मैं अगर हिन्दी और मेवाड़ी बोलना-लिखना छोड़ दूं और उदहारण के तौर पर किसी ओर भाषा जैसे अंगरेजी में ही बोलने-लिखने लगूं तो यह समझ लिजिएगा कि यह केवल भाषा का मुद्दा नहीं है प्रकारांतर से यह एक संस्कृति की दिशा को तय करने वाला विषय भी हैमैं अंगरेजी मजबूरी में बोलता हूँ जब कोई विदेशी मित्र मुझे दुर्ग चित्तौड़ पर भ्रमण के दौरान मिल जाए या फिर कहीं कोई पर्यटक रास्ते में भटका हुआ अनुभव हो। मसला बहुत लंबा है.हिन्दी इतनी संतुलन बिठाने वाली भाषा है जो खुले दिल से कई भाषाओं के शब्दों को अपने में समाहित कर अपना संसार बड़ा करती रही हैं बजाय इसके कि अड़ियल रवैया अपनाएं। इससे से हिन्दी आज देश की संपर्क भाषा बन रही हैंअंगरेजी को नौकरी पाने से ज्यादा कुछ समझने वालों का भगवान् ही भला करेगा (अगर भगवान् कहीं है तो )
  • चित्तौड़ में हमारे दोस्त अश्लेश दशोरा के जेसीस अध्यक्ष बनने पर शपथ ग्रहण समारोह। सेन्ट्रल अकादमी स्कूल ,चित्तौड़ का सेन्ट्रल हॉल,अतिथियों में नए एसपी प्रसन्न कुमार खिमेसरा जी.मंच पर नए अध्यक्ष की पत्नी के अलावा सभी पुरुष।पांडाल में श्रोता कम दर्शक ज्यादा।मैं भी सुनने के बजाय देर तक आयोजन को देखता ही रहा। बच्चे, महिलाएं, परिचित साथी सभी अपने व्यक्तित्व निर्माण के लिए आयोजन से एकदम कठ्ठे जुड़े हुए प्रतीत हुए. शाम साढ़े पाँच की शुरुआत से लेकर रात  नौ बजे के डिनर तक चला आयोजन। उपहारों का लेनदेन,शपथ बोलने-अनुकरण करने के दुहराव,भाषणों के बीच सूप की चुस्कियां।डिनर के समय मैंने देखा एक मेरे अलावा सभी सूटेड-बूटेड थे,मैं ही मफलर-टोपी-जर्सी-सेंडल-मौजेधारी था.सबके गलों में टाई,सबके कोट पर बिल्ले,सबके चेहरों पर एक छिपाव, सबके व्यवहार में एक अतिरिक्त ओढ़ावा। अलग अनुभूति. तमाम क्लीनशेव लोगों में इकलौता मैं ही दाढ़ीधारी.कई औपचारिकताओं के बीच अगर कोई अनौपचारिक था तो वो मेरा मित्र ही था जिसके बुलावे से मैं खींचा चला गया. एकदम अलग तरह का कल्चर.मुझे उनका ब्लड बैंक वाला कोंसेप्ट और उनके आयोजनों का डिनर पसंद आता है. लगातार दो शपथ ग्रहण समारोह से कुछ अंदाजे हो आए हैं.कई परिचितों के होने से ऐसी पार्टियों में सहजता आ जाती है वरना एक मिनट के लिए तो मैं खुद को वहाँ से भाग निकलने को कह रहा था.खैर मुझे कई सारे विचार बिंदु देने वाला ये आयोजन भी निबट गया.

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