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19 फ़रवरी, 2014

19-02-2014

मेरे लिए चित्तौड़ का मतलब कभी-कभी डॉ ए एल जैन भी होता रहा है.बहुत लम्बे अरसे तक बापू नगर सेंथी का ए-चौसंठ,शुभम का अर्थ तो जैन साहेब का ही घर रहा है जहां से हमारी दौड़ शुरू और ख़त्म होती रही.यों उनसे कभी पढ़े नहीं मगर फिर भी वे हमारे गुरु हो गए.हम भी अच्छे वाले शिष्य निकले.सुझावों पर अमल करते,कहे पर हामी भरते और एक आदेश पर दौड़ जाने वाले चेले.उन्होंने कभी भी हमें अपना अनुयायी नहीं बनाया और खुद भी कभी मठाधीश नहीं बने.उनका काम ही मठाधीशी के खिलाफ खड़े होने से शुरू होता लगा है.विचारधारा के भंवर में वे कभी नहीं फंसे.जीवन में दोगलेपन से वे अमूमन दूर ही दिखे.शहर में एक सुविधाजनक आदमी के रूप में उनकी पहचान हमें उन पर फ़िदा करने में सहूलियत देती रही,आज भी हम उनके साथ महफूज समझते हैं.एक दिशासूचक की तरह वे हमेशा मशवरे देते हैं.यात्रा इतनी लम्बी चली कि हम उनकी ज़बान से कहे तो 'माणिक' से 'माणिक जी' हो गए.ऊँचें होते कद और समझ में बढ़ोतरी उन्हीं की बदौलत है.

बीते दिन की शाम एक घंटे उनसे संगत हुयी तो कहना चाहता हूँ कि हमारे दिशासूचक डॉ.ए एल जैन की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक के कवर पेज अंतिम चरण में हैं.यह पुस्तक चित्तौड़गढ़ में जैन धर्म से जुडी समस्त तथ्यात्मक जानकारियों सहित चित्तौड़ दुर्ग का एतिहासिक दस्तावेज भी साबित होगी.यह पुस्तक जैन धर्मावलम्बियों के साथ ही आने वाले पर्यटकों के लिए भी उपयोगी होगी.पुस्तक में रोचक तथ्यों सहित चित्तौड़ में रहे-बसे जैन विचारकों का हवाला है. उस साहित्य का संक्षिप्त ज़िक्र है जो यहीं रहकर रचा गया. जैन आचार्यों और तात्कालिक बादशाहों के बीच के संबंधों को भी यहाँ पुस्तक में समुचित रूप से उकेरा गया है.जैन साहेब के ही शब्दों की उधारी में कहूं तो शक्ति और भक्ति की नगरी पर सरस्वती को धरती सिद्ध करने की एक जुगत भी यह पुस्तक साबित होगी.चित्तौड़ के दर्शनीय स्थलों की जानकारी सहित इसमें कई शिलालेखों की इबारतें और छायाचित्र प्रकाशित होंगे.पुस्तक को अंतिम रूप देने के प्रोसेज में मैं भी कहीं-कहीं इसमें शामिल होता रहा हूँ.संभतया कवर पेज चित्तौड़गढ़ के ही युवा चितेरे मुकेश शर्मा के चित्रों को आधार बनाकर बनेगा.गौरतलब है कि यह पुस्तक डॉ ए एल जैन के कई सालों की मेहनत और बीते एक साल के गहन अध्ययन का नतीजा है.इस बीच उन्होंने वीर-विनोद से लेकर गोरीशंकर-हिराचंद ओझा सभी को दो-दो तीन बार पढ़ा है.मूल रूप से केमेस्ट्री के प्रोफ़ेसर डॉ जैन की साहित्य में फोरी तौर पर रूचि रही है.वे पूछने या नहीं भी पूछने पर कहते रहते हैं मैं अपनी सीमा जानता हूँ मैं ज्यादा आलोचना-समालोचना और पाठालोचन जैसी गंभीर किस्म की शब्दावली साहित्यिक माहौल में पड़ना नहीं चाहता हूँ.हाँ समाज और धर्म के लिहाज से भी वे पर्याप्त रुचिशील ढ़ंग से अध्ययन करते रहे हैं.इस पुस्तक में उनके मतानुसार कुछ गहरी सेवा भावना के साथ काम कर रहे समाज के सेवकों का भी ज़िक्र आया है.

लगे हाथ थोड़ा सा अतीत में लौट लें.जैन साहेब से पहली मुलाक़ात सन दो हजार दो में हुयी थी.जब स्पिक मैके अपनी स्थापना के रजत जयंती वर्ष में था.मैं विद्या विहार जैसे निजी स्कूल में नौ सौ रूपए महीने की पगार पर टीचरी कर रहा था.अपनी बीए की पढ़ाई के दौरान स्वयंपाठी होते हुए भी महाराणा प्रताप पी जी कॉलेज में यदा-कदा जाता रहा(तब शायद इसका नाम महाराणा प्रताप नहीं था.).खासकर संस्कृत के वेदचयनम वाले पेपर के लिए विनय शर्मा मेडम की क्लास में.वहीं हरीश खत्री ने मुझे पकड़ा और स्पिक मैके में दाखिला दे दिया.हरीश ने नहीं सोचा होगा कि यही माणिक लम्बी रेस का घोड़ा साबित होगा.खैर तब डॉ जैन स्पिक मैके के अध्यक्ष हुआ करते थे.संपर्क बढ़ता रहा.अगले साल ही सचिव बना दिया.कॉन्सर्ट में आते-जाते रहे.पिकनिक  सरीखे सपाटे भी हुए.फिर तो उनके घर आना-जाना हुआ.हम जैसे गाँवड़ेल तब इसी बहाने आने-जाने,डोर बेल बजाने,सोफे पर बैठने,बड़े आदमी के सामने चाय सुड़कने के सलीके सिख रहे थे.वैसे वे हमेशा अपने बहुत गंभीर किस्म के अपीयरेंस में पेश होते तो हम अकसर डरे ही रहते थे.हाँ उनसे एक शर्म हमेशा से ही बनी रही.उनका हम में बड़ा अनुराग और स्नेह है.खासकर देहाती युवाओं के साथ वे अतिरिक्त अपनापा दर्शाते हैं.तब देहात का मतलब मैं खुद,अरनियापंथ का लालुराम सालवी और वहीं का गोवेर्धन बंजारा था.आज भी वही अपनापन बरकरार है.

कई बार शहर के बाहर भी उनके साथ यात्राएं की.डॉ जैन ने हमें रिश्तों की केअर करना सिखाया.अब भी वह स्नेह की डोर बहुत प्रगाढ़ रूप में तनी हुयी है.पंद्रह दिन बिना फोन-फान के बीत जाए तो डांटने के लहेजे में उधर से आवाज़ आती 'बड़े आदमी हो गए हो, फुरसत नहीं है क्या,हमारे रिश्ते ऐसे भी नहीं है भाई' .हम शर्म से लजा जाते.खैर हम बढ़े होते रहे.फिर तो स्पिक मैके में ही मैं उनका सचिव भी रहा,एक नहीं दो-दो बार.वक़्त के साथ उनके साथ रिश्ता ऐसा हुआ कि डर भांग(ख़त्म )गया.अब उतना डर नहीं लगता मगर आज भी एक अंतराल के साथ आँखों में शर्म बचा के रखी है जो हमारे संस्कारों की परिचायक है,होनी भी चाहिए.मुझे उन्होंने कई संस्थाओं से जोड़ा और ईनाम दिलवाए.वक़्त ने हमें भी समझने का मौक़ा दिया मगर ज़माने की कई टेड़ी परिभाषाएं मैंने जैन साहेब से ही सीखी.जब भी उनके घर जाओ एक-दो पुस्तकें रिकमंड करते दिखते.मतलब वे बहुत विस्तार के साथ पढ़ते हैं और उसी में से कुछ पढ़ा हुआ उनकी बातों में झलक ही जाता है.एकदम सात्विक किस्म के आदमी हैं जैन साहेब.एक भी आदत ऐसी नहीं कि खीज हो.'आकर्षण' क्या होता है उनके साथ खिंचकर चले जाने से ही समझे हैं.देश और समाज के बीच जीने का सलीका और बेहतर रास्ते हमें उन्होंने भी सुझाए हैं.

उन्होंने कभी सरकारी कॉलेज की प्रिंसिपल वाली नौकरी से वीआरएस लिया.मेवाड़ गर्ल्स कॉलेज में विजन स्कूल ऑफ़ मेनेजमेंट जैसे संस्थानों में प्राईवेट नौकरियाँ की मगर जल्द ही उब गए.असल में वे नियमों और उसूलों के आदमी ठहरे.सोचने-समझने और पूरे संयम से फैसले लेने वाले इंसान.कभी-कभार के उनके गुस्से के आगे कोई ठहर नहीं पाता था.अच्छे खासे की धूजणी छूट जाती.उनके सानिध्य में काम करना भी अलग आनंद का मसौदा रहा.उनका दख़ल मानव सेवा के क्षेत्र में भी रहा.वैसे उनकी रुचियाँ ग़ज़ल और शेर सुनने-कहने में रही है.वे कभी भी रोटरी-लायंस-जेसीस-भारत विकास परिषद् किस्म की संस्था से प्रभावित नहीं हुए.राजनीति और अफसरों से पर्याप्त दूरी ही उन्हें भायी.आज भी आयोजनों में उनकी शिरकत में उनके अपने सिद्धांत आड़े आते हैं तो वे नहीं जाते.अरे हाँ एकाध आँख-कान-नाक और दांतों के शिविरों में हमने भी सेवा की, प्रेस नोट दिए, फोटो खींचे, दरियां बिछाई, मेहमानों को लाये-ले गए, नास्ते-पाणी के कई आयोजन निबटाए, एक दो संगोष्ठियाँ उनके घर पर भी सजाई. कई बारी बैठकों के शुरू होने से पहले टेबले-कुर्सियां कपड़ों से पोंछी, पौछे लगाए, कई बार की रसोई-पाणी के कार्यक्रमों में आखिर में बर्तन-भांडे टेंट वाले के यहाँ पहुँचाने तक के काम में जैन साहेब हमारे साथ मुस्तेद रहते थे. यही अदाएं हैं उनकी जो हमें उनसे प्यार करने को प्रेरित करती हैं.वैसे यही उनका काम करने का जुदा तरीका है.एक तरह का पर्सनल टच. कई बार ऐसा भी हुआ था कि असमय की भूख के बीच हमने उनके साथ चाय-बिस्कुट-सेव-नमकीन से वक़्त गुज़ारा.कुल मिलाकर एक सुविधाजनक और आत्मीय व्यक्तित्व की छाया में हैं हम.शुक्रिया जैन साहेब हमें अपने इतना करीब रखने के लिए.आपका माणिक

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