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24 फ़रवरी, 2014

24-02-2014


  • जून में आयोज्य एक महोत्सव के सपने मन में हिलोरने लगे हैं.सास-ससुर ठीक हैं.सालेजी का धंधा ठीक से चलायमान है.मम्मी की बीपी वाली एक गोली रोज़ाना बरक़रार है.इधर अनुष्का के नयी साईकल आ गयी.राजेन्द्र सिंघवी के अनुरोध पर निम्बाहेड़ा में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में भोजन कर आये.डॉ कमल नाहर साहेब का आतिथ्य स्वीकार आये.आरएएस के इंटरव्यू की तैयारी कर रहे पक्के वाले दोस्त जीतेन्द्र सुथार को मिलकर बधाई दे आया.पिताजी ने बताया तो गाँव में भरा हुआ गैस सिलेंडर रख आया.सारे काम समय पर.भाई विमलेश त्रिपाठी, हरीश करमचंदानी जी और दोस्त अशोक कुमार पाण्डेय का कविता संग्रह पढ़ लिया.जोधपुर आकाशवाणी के संजय व्यास की नयी पुस्तक 'टिम टिम रास्तों के कास' आधी ही पढ़ पाया.किशोर चौधरी की नयी किताब पढ़ना बाकी है.इधर हमारे मुसीबत के दोस्त राजेश चौधरी अपने साथी अंगरेजी के व्याख्याता डॉ. के एस कंग के साथ दिल्ली पुस्तक मेले में जा आए.पता चला कनक भैया के घर 'बनास जन' और 'चौपाल' के अंक आ गए हैं,बस लाने बाकी है.बहन अपने पीहर आयी हुयी है.ब्याईजी को ज़रूरत के मुताबिक़ ढ़ाई हजार उदरत दे आया.प्लाट की किस्तें जारी हैं.सेलेरी का इंतज़ार करने की आदत फिर से पड़ने लगी है.बाकी आनंद है.डॉ ए एल जैन साहेब की किताब आने वाली है.घर में शांति है.स्कूल जिंदाबाद है.मुआफ करना इन दिनों एक भी कविता नहीं उपज पायी.स्कूल के रास्ते फोरलेन बनना जारी है,लगे हाथ खेतों  के बीच वाले रास्तों का आनंद ले रहा हूँ.नया ईयरफोन खरीदा है दखो कितने दिन चलता है.शहर अपनी गति से आगे बढ़ रहा है.कुम्भा नगर पुल अभी नहीं बन पाया.लोगों से मिलना जारी है.फिर भी कुछ कमी सी है.थोड़ी सी कमी तो हमेशा रहनी ही चाहिए
  • हमारे साथी और जानकार कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण जी व्यास ने आकाशवाणी चित्तौड़ में फिर से ज्वाइन कर लिया है.उन्हें बधाई.याद आया इन्हीं के सानिध्य में हमने कभी आकाशवाणी में कविता पाठ और वार्ता देना/लिखना सिखा था.बाद में तो खैर पाठक मंच और संभावना की गोष्ठियों में मुलाक़ात भी हुयी.परिचय बढ़ता रहा. बहुत बाद में जाकर हम व्यास जी की मेधा का जलवा समझ पाए.बहुत साधारण और सहज इंसान.एकदम पढ़ाकू.एकाध बार हमने उनसे इन्डियन क्लासिक सिनेमा को लेकर भी वार्ताएं सुनी.श्याम बेनेगल, चार्ली चेपलिन और सत्यजित रे जैसे शब्द हमने उन्हीं के मूंह से पहली बार सुने.एक दोपहर हमने उन्हीं की देखरेख में 'सूरज का सातवाँ घोड़ा' भी देखी थी.तब बेनर स्पिक मैके का था.पिछले साल की ही उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल की यात्रा में उनके साथ के अनुभव तो खैर अभी ताज़ा ही है.वे बच्चों के साथ एकदम बच्चे बन जाते हैं.अनुष्का के साथ की उनकी मुलाकातें देख मैं ईर्षा करता रहता कि काश मेरे भीतर भी ऐसा 'बच्चा' होता.एक से एक गंभीर कला के प्रति सचेत पाठक की तरह वे राय देते.कई पत्र-पत्रिकाओं को लगातार पढ़ने की आदत वाले हैं हमारे लक्ष्मण जी. अरे हाँ एक बात तो भूल ही गया वे बड़े गज़ब के प्रकृति प्रेमी हैं. अवकाश पाते ही पहाड़ों के बीच एकांत.हमविचार साथियों के साथ रमे रहते हैं.वे जब चित्तौड़ आ गए हैं तो यहाँ के सांस्कृतिक और साहित्यिक माहौल में भी फरक आयेगा.खासकर सिनेमा जैसे गंभीर विषय पर एक विशेषज्ञ तो हमें मिल ही गया.
  • आभासी माध्यम के साथ ही फोन पर बातचीत का आनंद तो मैं भूल ही गया था खासकर तब जब आप किसी बड़े रचनाकार से बतिया रहे हों. आज पहली बार वरिष्ठ कवि विजेंद्र जी से कुछ लम्बी और शुरुआती बात हुयी.
  • बलराज साहनी साहेब की इज्ज़त पहले भी करता रहा मगर 'गरम हवा' में सलीम मिर्ज़ा के रूप में उन्हें देखने-समझने के बाद इज्ज़त ओर बढ़ गयी.

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