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27 फ़रवरी, 2014

27-02-2014


पहले से तय हुए मुताबिक़ आज की छुट्ठी में हमने अव्वल तो शहर में हिन्दी का एक केंद्र बिंदु हमारे दोस्त डॉ राजेश चौधरी के साथ अनुभव सुनने में बिताई.राजेश जी के लिए दस बजे मिलना मतलब दस बजे ही होता है.मेरी बीस मिनट की देरी पर मुझे उनके साथ रहने के कुल समय में से आधे घंटे की कमी का खामियाजा भुगतना पड़ा.डॉ राजेश जी पर्ची पर दवाई-गोली लिखने वाले डॉक्टर नहीं हरिशंकर परसाईजी पर पीएचडी किए डॉक्टर हैं. बातें भी स्टाइल मार कर करते हैं. पहले तो हम दोनों लगे हाथ डॉ सत्यनारायण व्यास जी के घर गए जहां हमने जी-भर कर पूरे देश के सामयिक परिदृश्य पर चर्चा की.शोध और आलोचना में फरक पर. लगातार आ रही पत्रिकाओं के कमजोर पक्षों पर, कथा और कविता के बीच की प्राथमिकता पर, पुस्तक मेले पर, शहर के साहित्यिक माहौल पर. प्रादेशिक साहित्यकारों और उनकी आदतों पर. तरह-तरह से बातें छिड़ी. ज्ञानवर्धन हुआ. मैंने दख़ल देने के बजाय सुना ज्यादा. चर्चा में रेणु दी और चन्द्रकान्ता जी व्यास भी शामिल समझी जाए. व्यास जी ने बड़ी गज़ब बात कही आजकल जिस तरह से विश्वविद्यालयों में प्रोफ़ेसर, असोसिएट प्रोफ़ेसर होते हैं,उन्होंने एक दिन पहले ही उदयपुर में हुयी एक दिवसीय सेमीनार के अपने वक्तव्य में से कहा कि ''आजकल प्रोफ़ेसर दो तरह के होते हैं एक 'पदेन' और दूसरे 'ज्ञानेन'. ''


दो घंटे की इस संगत के बाद हम राजेश जी के घर आए वहाँ पुस्तक मेले से लगभग आठ हजार की राजेश जी की खरीदी गयी पुस्तकों पर फोरी तौर पर चर्चा की.एक बार फिर जाना कि उनकी रूचि कथा और उपन्यास में ही है.उनकी खरीदी गयी कृतियों में दो ही किताबें ग़ज़लों की थी.बाकी उपन्यास,कहानी संग्रह या संकलन,एक समानान्तर शब्दकोष भी लाए जो एनबीटी ने छापा है वो भी वे ले आये.कविता-वविता में उनकी रूचि नहीं है.खासकर समकालीन कविताओं में.वैसे वे कविताएँ पढ़ते रहे हैं मगर खरीदकर कविता संग्रह नहें लाये.उन्होंने संजीव, अल्पना मिश्र, वंदना शुक्ल के नए उपन्यास ख़रीदे. हिमांशु पंड्या के सम्पादन में स्वयं प्रकाश जी का नया कथा संकलन, रविन्द्र और ममता कालिया की प्रेम कहानियां, लोकोक्तियों और मुहावरों के कोश ख़रीदे. निर्मल वर्मा, यशपाल, अमरकांत के कथा संकलन, ग़ज़लकार अदम गोंडवी और राजेश रेड्डी के नवीनतम संग्रह और निराला संचयिका भी वे खरीद लाए.

किताबें उनसे मांगकर पढूंगा. पहले भी लिखा वे किताबें बड़ी सहेज और जमा कर रखते हैं.उनकी इस खरीदी पर सुमित्रा भाभी जी बोलीं एक आलिया और इन्होने कब्जा लिया और इसमें रखी सारी ट्रोफ़ियां ऊपर वाले आलिए में सरका दी,बहुत कंजस्टेड हो गया है ना.इन ट्रोफियों को कहीं दूसरी जगह सरकाना अही पडेगा.किताबों से जुडी उनकी यात्रा के चर्चों के बीच उनके और के एस कंग साहेब के बीच की फक्कड़ी के किस्से भी आते-जाते रहे.फिलहाल राजकमल की भेंटी सुन्दर डायरी उन्होंने मुझे चस्पा कर दी.ले आया , डायरी बड़ी सुन्दर है.वैसे राजेश जी भी बड़े सुन्दर हैं. उनमें बाहर के साथ ही भीतरी सुन्दरता भी कायम हैं और अच्छी बात ये कि वे उस भीतरी सुन्दरता के ही लगातार सचेत रहते हैं..उनका भीतर भी मुझे उनके करीब ले जाता है.

दुपहर में दाल-बाटी ने देर तक सुस्ताए रखा.गहरी नींद के बीच एक अधिकारी के फोन पर अगले सन्डे की प्लानिंग संपन्न जिसमें इसी ज़िले के आकोला गाँव में रंगाई-छपाई के कारीगरों पर एक रूपक बनाने जाना फाइनल हुआ.इधर सुबह कवि और चित्रकार विजेंद्र जी से दो-तीन बार बातचीत हुयी.मैंने समझा और देखा कि उनकी उम्र वाले लेखकों में अधिकाँश इंटरनेट आदि को तामझाम कहने वाले ही रचनाकार हैं.मगर वे एकदम नवाचारी और अपडेट हैं.युवा पीढ़ी के साथ इस युग में भी इन तमाम नए संचार साधनों से भी संपर्क साधने वाले विजेंद्र जी.डिहर बीते दो दिन में एक परेशानी में जी अटका था. मेरी एक डायरी नहीं मिल रही. छोटा सा घर है जाने कहाँ घूम गयी.असल में उसमें मेरी कुछ अप्रकाशित और अनसहेजी कविताएँ थीं.दिल उदास है.खैर,सृजन तो ओर कर लेंगे.चिंता नहीं है.बहुत दिन से कविता बुन रहा हूँ मगर कागज़ पर नहीं लिखी गयी.मन है कि भीलों और गाड़िया लुहारों पर एक श्रृंखला लिखूं.मौके और वक़्त के इंतज़ार में हूँ.इधर कुछ नयी पत्रिकाओं में कविताएँ भेजी है.इसी दौर में कितना अजीब है इधर मैं स्वयं कभी-कभी अपनी माटी के लिए सम्पादन करता हूँ और इसी के समानान्तर खुद की कविताओं के लिए पत्रिकाओं के संपादकों से संपर्क करता हूँ.दोनों पक्षों को ठीक से अभिनीत किया है मैंने.

आज महाशिवरात्रि का दिन था. मतलब अवकाश. मंदिर, आरती, यज्ञ, आकड़े के फूल, बिल्व पत्र, लम्बी कतार, लाउड स्पिकर, महाराज, चन्दन टिका, दर्शन, व्रत, उपवास सरीखा कुछ भी नहीं. सवेरे बना अफीम के दाने का हलवा दोपहर में दाल-बाटी. शाम को गिरस्ती का सवाल था खरड़ेश्वर महादेव के दर्शन कराने घरवाली और अनुष्का को ले गया. मैंने चप्पलों का ख़याल रखा. साबूदाने की खिचड़ी के प्रसाद वाले दोने हाथ में थामे रखे तब तक जब तक पत्नी मंदिर में भगवान् देख कर ना आयी.मैंने मंदिर के बाहर आते-जाते हजारों भगवान् को देखा, उनसे मुस्कराया, बतियाया उन्हें नमस्ते-सलाम किया. उनकी कुशलक्षेम पूछी. उन्हीं में से कुछ भगवान् मिलने वाले निकल गए. उनसे ज्यादा गपशप हुयी. वहाँ कतार थी, प्रसाद था, दस-दस के हिसाब से फूल-मालाएं और बिल पत्र थे. पुलिस थी, रेलमपेल थी, आस्थावान लोगों का हुजूम था.बेतरतीब गाड़ियां थीं. पैदल उपवासी लोग और खासी संख्या में महिलाएं थी. कइयों से दिनों बाद यहीं मिला.शुक्रिया महाशिवरात्रि 

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