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11 मार्च, 2014

11-03-2014

नगीन तनवीर वो नाम है जिन्हें हबीब साहेब को नगीन-नगीन आवाज़ लगाते सुना है.नगीन जी का पहला रंगमंचीय अभिनय बनारस में देखा.ये बात साल दो हजार पांच-छ की होगी शायद.ठीक से गणित याद नहीं.गर्मियों के दिनों में बनारस के सात दिनी प्रवास में हबीब साहेब का निर्देशित बहु प्रसिद्द नाटक 'चरणदास चोर' देखा.रात के अँधेरे में एकदम खुले में देखा गया नाटक जो मेरे जीवन का पहला नाटक दर्शन था.उसी प्रस्तुति में नगीन जी को कई बारी गीत गाते देखा.छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के गाने वाले समूह में अगुवा थीं नगीन जी.बाद में सारनाथ घुमने में उन्हें अपने पिताजी के साथ टहलते देखा.वैसे हबीब साहेब के काम को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन सहित नया थिएटर के बाकी लोगों पर भी थी.नगीन जी प्रबंधन में उतनी सतर्क और तेज़ नहीं पड़ती जितने महारथ उन्हें अभिनय में है.स्पिक मैके में बाद के सालों में भी कोई तीन-चार मौके मिले जहां हबीब साहेब के काम को करीब से देखा.ऐसा एक भी अवसर नहीं था जब हबीब साहेब मिले और नगीन जी साथ ना हो.खुशकिस्मती ये कि हमने थिएटर का पहला और सम्पूर्ण स्वरुप ही हबीब साहेब जैसे दिग्गजों से जाना.खैर.ज़माना भले नगीन जी को 'पीपली लाइव' फिल्म के उस गीत से जानता हो जिसमें फिल्म के अवसान पर गाती हुयी सुनायी गयी है कि 'चोला माटी के लाल' मगर वे बहुत गंभीर और सधे हुए गले की गायिका हैं.

हबीब साहेब चल बसे.इस बीच नया थिएटर के बिखराव के पूरे चांस पैदा हुए मगर नगीन जी ने अपने ज़रूरी अवसाद से बाहर निकल तीसेक छत्तीसगढ़ी कलाकारों का वो नाट्य समूह सम्भाला.प्रबंधन में मंडली के बुजुर्ग साथी संगत करते रहे.यह वाकई सच है कि एक कलाकार कई बार प्रबंधन के झमेले संभाल नहीं पता है.कलाकार का अधिकाँश वक़्त सृजन और चिंतन में गुज़रना चाहिए मगर वक़्त के दबाव में आज देश के कई नामी कलाकार खुद के प्रबंधन के लिए सेक्रेटरी रखें को मजबूर हैं.क्योंकि इस घोर कलियुग में खाली कलाकारी से कुछ नहीं होता मेनेजमेंट भी उतना ही ज़रूरी है.चित्तौड़गढ़ के सैनिक स्कूल में भी एक बार नगीन जी के निर्देशन में हमने 'चरणदास चोर' का अभिनय कराकर अपने एक ज़रूरी सपने को पूरा किया.वो दिन वो कलाकारों की सेवा में गुज़री रात आज भी मिनटों में ही यादों के फलक पर तैरने लगती है.एकबार फिर भोपाल के भारत भवन में हमें हबीब साहेब के निर्देशन में उनके समय रहते पूरा नहीं हो सका नाटक 'कोणार्क' देखा.जगदीश चन्द्र माथुर के लिखे उस नाटक को देखने और समझने में हमें अपने वरिष्ठ मित्र और संस्कृतिकर्मी विनय उपाध्याय की मदद आज भी याद है.फिर ये जाना कि नगीन जी गाहे-बगाहे नाटक मंचन के अलावा भी गायन करती हैं.वे कुशल नृत्यांगना और संगीतकार के तौर पर भी अपनी भूमिका अदा कर चुकी हैं.ये बात उनके चित्तौड़ प्रवास के दौरान मैंने सूनी मगर कभी कोई रिकोर्डिंग ठीक से हाथ नहीं लग सकी.यूट्यूब पर उनके गाये गीतों की सामग्री कमोबेश नहीं के बराबर हैं.अभी पता चला होली के मौके पर भोपाल की प्रसिद्द और गंभीर कलाकर्म को पोसती पत्रिका 'कला समय' उनका एकल गायन करवा रही है.ये भी पता चला कि वे सुलोचना ब्रहस्पति जी की शिष्या हैं,फिलहाल भोपाल में ही यथासमय रमाकांत-उमाकांत गुंदेचा जी से ध्रुपद सीख रही हैं.

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