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06 जनवरी, 2011

किले में कविता:-''तुम्हे घर का कहूं या मेहमान ''


घोड़े,ऊँट और हाथी नहीं रहे
अब तोफें हो गई मौन है
झर्झरपन पर रोज़ बिलखते
उन महलों का मालिक कौन है
कचोटता है मन आज कुछ ज्य़ादा ही 
देख नज़ारा गड़बड़ का 
रखता नहीं कोई ख़याल वैसा इनका
मरता भी नहीं कोई इन पर अब
कभी कभार दिहाड़ीया  मज़ूर 
थथेड़ जाते रेत-सीमेंट जैसा कुछ
दिन कट जाते उनके कुछ और 
सबुरी थी उनकों प्राथमिक उपचार में ही
बन गई कब ये आदत पक्की
सबुरी की गठरी ढ़ोते-ढ़ोते
उन मज़ूरों को कहें भी तो क्या जो 
कभी बांधकर लकड़ी के डंठल दो-चार 
मचान बनाकर हो जाते छू मंतर
अलगे मस्टररोल की बारी में 
लम्बे दिनों के बाद फिर कभी
कब तक बाट जोहता रहे 
यूं किला मेरे शहर का
मुंह ताकता रहे,टूंगता रहे
पल-पल ढ़लते इस आलम में
दिल मेरा भी कुछ ढ़लता है
 कब तक दूर से झांकोगे तुम
नफे की बातों से मिले जो फुरसत 
अरे आज के मालदार राजाओं 
कभी तो लांगो घर देहरी
दूर-दूर तक जिसकी दस्तक 
अब इसकी असली पीड़ा जानो
ये हम सब की शान है
कुछ हद तक पहचान है
अब भी उपजता है 
बाज़ारों का ठाठ यहीं से 
यहीं जन्मती सबकी भोर
रूप बिगाड़ कर पत्थरों में बिखरी
पुरखों की इस दौलत से 
तुम फिर भी हो अनजान
तुम्हे घर का कहूं या मेहमान

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