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09 जनवरी, 2011

किले में कविता:-बंटवारा

जी करता है आज बाँट लें
किले की सारी दौलत
कुछ तुम रख लो,कुछ मैं रख लूं
ये हम सब की माया
आदर तुम दे न पाओ शायद
कुछ धन जुटा लो जल्दी
कलियुग की लूट कहा लो भले
बस जितना आया,उतना पाया
चढ़ावा देते मंदिर 
लालची लोग ले जाएं चाहे
खंडित मूर्तियाँ ही दे देना मुझे
स्वार्थ यही पलता है मन में
धीर धरूं और ध्यान करूं
यहीं रहे सब कुछ वैसा ही
कुछ तोड़फोड़ न होए
बगिचों की आभा उनके हिस्से
लिख दो सरोवर का पानी इस पार
सीताफल की फसल उन्हें दे दो
फरक नहीं मुझको चाहे कम मिले
हिस्से में उनके चारागाह आ जाए
मेले की धक्का-मुक्की मुझको
तीज-त्योंहारी आलम वे छीन लें भले
मेला उठने पर पिछे बचा कूड़ा-करकट
खुद अवेरना मैं चाहूँगा 
चमकीले गुम्बद नहीं चाहता तनिक
हालिया जिर्णोद्धार से निबटे
दरवाजे दे दो उन्हें
जो देर तलक यहाँ नज़रें लगाए बैठे हैं
मैं तकता हूँ बिखरे पत्थर  
बसता है इतिहास कहीं जिनमें
टिकट वाले स्तम्भ-संग्रहालय
न मांगूं न चाहूँ 
तथ्य बतलाते गाइड दे देना बस
बचाना सत्यानाशी लपकों से
जुबां पर जिनके तथ्यों से भारी भाव है
जानता हूँ पहले से ही
हरे पेड़ उनको चाहिए होंगे
दे दो उनको भले मगर 
भूल न जाना मुझे चाहिए
उदड़ी हुई दिवारें,बेतरतीब मैदान
गोरा-बादल,जेमल-फत्ता की गाथाएं
तुम भी जानो,हम भी जाने
मीरा-पन्ना की इस माटी को
पढ़ा बहुत किताबों में
हाँ और कुम्भा-रतन हुआ करते थे
 ये सारे पौथी-पानड़े उनको दे दो
भाव इन पुरखों का 
बक्श देना मुझको बस
जिसकी ज्यादा आदत है
ऐसा हो बंटवारा बस
उनकी बात भी रह जाए
और दिल मेरा भी रह जाए

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