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13 अगस्त, 2012

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गाँव के गोरमा में नीम के नीचे बनी एक आठ बाई दस की टपरी में नौ इंसान,चार बकरियां,आठ कुकड़े रहते-खाते-पीते और सोते-जागते हैं.तेज बारिश में चूती इस झोंपड़ी में से सबसे बड़ी वाली बेटी पुष्पा के गोना हो जाने के बाद से अमरा,नारायण और सुनील अपने बड़े पिताजी के घर सोते हैं.घर का बेपरवाह सा दिखता मालिक मूलचंद हर साल पैदल जात्रा पर रामदेवरा चल देता है.पत्नी का नाम याद नहीं आ रहा मगर बेचारी है ये बात पक्की है.खेती खाली आधा बीघा ही पांती आयी.मजदूरी और पड़ौस के गाँव के घरों की खट्टी छाछ से गुज़ारा चल जाता है.कंट्रोल के गेंहू नहीं होते जाने क्या होता.फिलहाल सभी सांस ले रहे हैं.अन्दर और बाहरी हर आगंतुक के लिए ये कुटिया कुतूहल से भरी होती है.

इस यथार्थपरक कहानी के केंद्र में उपस्थित भील दम्पत्ती की उम्र चालीस प्लस पांच होगी.नारायण छटी में पढ़ता हुआ आगे जाकर कुछ कमाल करे तो करे बाकी गाड़ी अधरझूल में ही हैं.वैसे भीलों का भगवान् होता है.ऐसा उन सभी का मानना है जो अक्सर हेंडपंप पर नहाने या बेवड़े/केन भरने आते वक़्त मेरे से टकराते हैं.जताते रहते हैं.सुनील मेरी स्कूल की चौथी का छात्र है.रोजाना नसरगंडी  के कामड़ी से पहली और दूसरी के बच्चों को चार्ट पर गिनती और अ-आ बुलाते वक़्त एक मास्टर की पूरी एक्टिंग करता है साला.शक्ल से गोरा गट और मेहनती नज़र आता है. लगातार दो साल से वार्षिक परीक्षा के ऐनवक्त गायब होकर भी सरकारी नियमों की आड़ में आगे की कक्षा में फलांग जाता है.यहाँ बहुत सी चीजें अजब-गज़ब की श्रेणी में आती है.खैर बाकी पात्रों में सुनील से उम्र में छोटे के क्रम में अब हेमराज का नंबर है जिसे सभी ढिंका कहते हैं वो भी इसे नाम से फट सुन लेता है बाकी तो चिल्लाते ही रहो.झंडे तक ही कपड़े सिलवायेगा ठान के ही स्कूल में भर्ती हुआ है.कौन जाने ये उसकी माँ की मजबूरी है या सालाना आदत.बिना जाने टिका-टिप्पणी अच्छी नहीं. 

अगले पायदान पर मूलचंद जी के सुपुत्रों में मुकेश है जो हाल तो पांच साल का है बोलता नहीं बस खाता हुआ/ रोता हुआ/ मुस्कराता हुआ/ और ज्यादा कुछ हुआ तो गाँव के गंडक से डरकर भागता हुआ देखा जा सकता है.हम उसे प्यार से पूंछड़ा कहते हैं.अभी सूचि ख़त्म नहीं हुयी.सबसे छुटकी कभी कभार चावल खाने के चक्कर में स्कूल आती है.उसका नाम रीना है.एक बात कहूं नाम सारे के सारे चमचमाट है.सभी दया के पात्र.सभी सादगी संपन्न.सभी मिड डे मील पसंद औलादें.सभी पिछड़े.सभी चयनित के गुलाबी कूपन वाले के हिस्से .सभी नरेगा के लिए अपनी उम्र बढ़ाने में लगे हुए से दिखते हैं.

इनकी बकरियां पहले पुष्पा चराती थी अफसोस वो ससुराल चली गयी.मतलब एक कमाऊ पूत चला गया.दूजे नंबर वाली अमरा की मंगनी हो गयी है.पिछले साल तक तो बकरियां फेर लाती थी अब ठीक-ठाक रूप में एक पूरे मजदूर जात दिखती है दिन में खेती-मजूरी के बदले एक सौ पचास कमा लाती है.माँ का सबसे बड़ा सहारा है.बकरियों का जिम्मा स्कूल की छूट्टी के बाद नारायण और सुनील ले दे कर अदल-बदल के जुगाड़ बिठाते हुए कर लेते हैं.गृहस्ती रास्ते पर प्रतीत होती है मगर शायद है नहीं.

सभी इस झोंपड़े से दिन में काम-धाम के बाबत चले जाएँ तो कुकड़ों की निगरानी में ढिंका हाजिर रहता है.रीना अभी दूध पीती है तो माँ के साथ ही रह लेती है.मुकेश इधर-उधर रोते फिरता हुआ वैसे ही बढ़ा होता जा रहा है.उन्हें अतिरिक्त उत्साह से भरा विश्वास है कि एकाध साल की देर है फिर तो स्कूल वाले नवप्रवेशी करार दे कर उसे खुद ही पाल लेंगे.सभी को नए कूपन बनने का खासा इंतज़ार है.इंतज़ार है अपने पिताजी के रामदेवरा से लौटने का. 

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