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06 सितंबर, 2013

06-09-2013

फुटकर टिप्पणियाँ 
  1. मित्रो, मुझ जैसे 'नाचीज़' को अपनी 'ज़मीन' और अपना 'आसमान' ठीक से मालुम है, मैं इन 'तथाकथित बुलंदियों' से प्रभावित न तो कभी रहा न ही आगे गुंजाईश है(एक आदमी जिसे अपनी 'रफ़्तार' और 'मुकाम' का ठीक से अंदाजा है उसे अपने 'आसपास' का भी उतना ही ख़याल है)
  2. प्राथमिकता वाले कामों के कारण कई मर्तबा एक भले आदमी की 'व्यस्तता' को प्रश्नांकित करना गलत निर्णय हो जाता है
  3. साहित्य और संस्थाओं में इतना लोकतंत्र तो हमेशा महफूज रहना ही चाहिए कि एक हद तक सभी की विरोधाभासी राय होना अच्छा संकेत माना जाए.कमोबेश रूप में ये ही संकेत संस्था को अँधेरे में जाने से बचाते हैं
  4. एक वाक्य है जो बार-बार सुकून देता है कि 'अच्छा हुआ हम किसी के अनुयायी नहीं हुए' , हाँ अनुसरण ज़रूर करते हैं मगर गलत का प्रतिकार करना भी हमने उन्ही अगमचारियों से सीखा है
  5. लगे हाथ आश्रमों में दान दी या ली गयी 'अपनी-अपनी ज़मीनें' वापस हथियाने की गुहार लगा ही लो
  6. संवेदनशील इंसान ताउम्र सुन्दर ही रहता है भीतर से खोटे आदमी इस सांचे में फिट नहीं बैठते
  7. शाम किसी विद्वान के घर चाय और विमर्श में बीत जाए इससे बड़ा आनंद दूजा कहाँ।

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