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23 नवंबर, 2014

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के,अब अन्धेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के 
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यह अपील करते हुए मुझे पूरा अहसास है कि कभी तो हम गांवों और गरीबों को लेकर कुछ सीरियस स्टेप्स लेंगे.आज सरकारी स्कूलों में जो बच्चे पड़ते हैं वे लगभग गरीब और वंचित वर्ग से ताल्लुक रखते हैं.उनके पास अपनी पठन सामग्री खरीदने तक के भी पैसे नहीं हैं ट्यूशन तो जाने कब कर पायेंगे.उनके अभिभावक लगभग अनपढ़ और अपने जीवन के जुगाड़ में ही इतने थक-हार जाते हैं कि समझ ही नहीं पाते कि इस फटे हाल को कहाँ-कहाँ से सिले.मामला बड़ा गंभीर है.देश का बड़ा हिस्सा गाँव हैं.इन बच्चों को घर में ठीक से भोजन नहीं मिल पाता आप पौष्टिक की बात करते हैं.उनके घरों में पढ़ने-लिखने का अलग कमरा तो छोड़ो टेबल-कुर्सी तक नहीं मिलती.पेरेंट्स मीटिंग के लिए इनके माँ-पिताजी को वक़्त नहीं है.घरों में शोचालय नहीं है.लड़कियों को शोच्जाने के लिए अन्धेरा होने का इंतज़ार करना पड़ता है.होमवर्क क्या बला है वे नहीं जानते.सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को घर पर पढ़ने के लिए कहने-टोकने वाला और प्रेरित करने वाला कोई बचा नहीं है शायद.स्कूल टाइम में अगर गाँव में दस-बीस बच्चे खेलते-टहलते मिल जाए तो अभिभावकों की जागरूकता देखें कि वे बीड़ी फूंकते रहेंगे मगर किसी से एक सवाल नहीं करेंगे कि स्कूल के वक्त में वे यहाँ क्यों? उन बच्चों को मालूम ही नहीं है कि उनकी प्रतियोगिता जिनसे है वे तमाम ज़रूरी सुविधाओं में जी रहे हैं और ज्यादा अपडेट हैं.निजी और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मिलने वाली आधारभूत सुविधाओं में ज़मीन-आसमान का अंतर है.इसलिए महानुभाव इन बच्चों की तुलना भी नहीं करें.हालात बहुत बदतर हैं.जहां गाँव के लोग जागरूक हैं वहाँ तस्वीरें बदल भी रही हैं.हमने भी अखबारों में कुछ खबरें पढ़ी है जहां गाँव जागे हैं.वैसे कह दें कि ये खाई जाने कब भरेगी.अव्वल तो यही चिंता का विषय है कि जिस युवा पीढ़ी को इस दौर में टीवी,मोबाइल और इंटरनेट का जिताना सचेत होकर उपयोग करते हुए आगे बढ़ाना चाहिए कर नहीं रहे हैं बल्कि वे इन समीकरणों में ही उलझ कर खुद का वर्तमान और भविष्य खोद रहे हैं.फिलहाल ये चिंता गाँव के गरीब के मद्देनज़र ही है.

इन चित्रों में दिख रहे ये बच्चे हर पिछड़ी बस्ती में मिल जायेंगे.मुझे लगने लगा है कि तमाम गरीब बच्चों की शक्लें एक सी ही होती है.सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले इन बच्चों की हालतें बड़ी खराब होती जा रही है.पहनने को कपड़े नहीं,रोज के लिए कॉपियां,जूते,मौजे,स्कूल बस्ता नहीं.मुफ्त में मिली है तो केवल किताबें.प्राथमिक कक्षा एक से पाँच तक कोई छात्रवृति भी नहीं है.पेन्सिल और पेन का टंटा तो चलता ही रहता है.पूरे कार्तिक मास वे दानकी/मजूरी करने को मजबूर होते हैं.लहसून चोपते हैं.सरसों कटवाते हैं.भुट्टे छिलवाते हैं.ये कई गांवों का सच है.कभी माँ-पिताजी के एक साथ मजूरी जाने पर घर पर मुर्गों,बकरियों की देखभाल करते हैं.कई छोटे बच्चों की देखभाल में ही जवान हो जाते हैं.कई आधे वक़्त ननिहाल चले जाते हैं.जिसके ज्यादा बच्चे होते हैं उन्हें कभी भुवा कभी,मौसी कभी,मामा अपने नवजात की देखभाल में हांक ले जाते हैं.

मेरा निवेदन आप लोगों से केवल इतना भर है कि अगर संभव हो तो आप अपने गैर ज़रूरी सामान इन तक पहुँचा दें तो इनका बड़ा भला होगा.घर में बिना काम में पड़े कपड़े,स्कूल बेग,पेन्सिल,पेन,जूते,मौजे,पुराने स्वेटर इन तक पहुंचाएं.अगर ज्यादा संभव हो तो कभी अपना जन्मदिन या शादी की वर्ष गाँठ मनाने के निहित कुछ राशि खर्च कर इनके लिए कॉपी,किताब खरीद कर भेंट कर दें.अपने आसपास के कुछ स्कूलों को देख गोद लें लें.यदा-कदा आते-जाते रहें.हमारे कई अध्यापक साथी भी अपनी गाँठ से ये खर्चा करते भी हैं मगर पूरा समाज जुड़ेगा तो दृश्य बदलेगा.ये पक्की बात है कि आप इस काम के बदले बहुत संतुष्टि मिलेगी.वैसे भी शिक्षा ही है जो अगर ठीक से मिल गयी तो पूरी तस्वीर बदल सकती है.

खाली दीपदान करने,बेकार में पटाखे फोड़ने,शादी-ब्याह में दिखावा करने से पहले सोचें क्या इन पैसों से आप किसी गरीब बच्चे तो जीवन दे सकते हो.जब गरीब सक्षम हो जाएगा तो समाज भी समानतामूलक बनेगा.गैर-बराबरी कम होगी.असल में यह उनको दी गयी भीख नहीं एक समर्थ की असमर्थ को मुसीबत में दी सहायता है.जितने भी सांस्कतिक और सामाजिक संगठन हैं अगर अपना कुछ समय किसी एक सरकारी स्कूल में लगाते हैं तो शायद कुछ बदलाव आ सकता है.बरिब बस्ती बहुल इलाके में चल रहे सरकारी स्कूल आपका इंतज़ार कर रहे हैं.

माणिक

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