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09 मार्च, 2013

09-03-2013

कविता करना अच्छा लगता है। पाठक की तलाश में फ़ेस बुक पर साझा करना और मित्रों के बीच से आती हुई टिप्पणियाँ मुझे प्रेरणा के स्तर पर आगे बढ़ाती है।जब भी लिख लेता हूँ तो हालांकि सुनाने की कोई जल्दी नहीं रहती है।कभी ज्यादा दिन हो जाते हैं तो ब्लॉग पर ही पोस्ट कर देता हूँ।कभी कभार अपनी माटी में भी। अशोक जमनानी मुझे अपनी कविताओं के साथ फोन पर अक्सर सुनते हैं।हाँ जब भी सत्यनारायण व्यास जी के घर जाता हूँ।वे कहते हैं जेब में से कारतूस(वो पर्ची या कागज़ जिनमें हाल की कवितायेँ लिखी हों।)निकालो और सुनाओ कुछ नया।क्या लिखा बीते दिनों।वे कहते हैं देखते रहो ,थोड़ा थोड़ा लिखते रहो।हमारे शहर में वे एक केंद्र हैं जिनसे ऊर्जा मिलती है।हमारे निमित्त तो सारे साहित्यिक और इससे इतर विमर्श यहीं से निकलते या ख़त्म होते हैं।शंका-समाधान यहीं से उपजते और समाप्त होते हैं।

हमारा मजमा उनके घर ही लगता है।बीच बीच में हम मेरे ,कनक भैया और राजेन्द्र सिंघवी के घर मिलते रहते हैं।कभी दो-दो करके तो कभी तीन-के-तीन एक साथ।उनके घर हम अलगअलग भी जाते और एक साथ भी।जो किसी दिन छूट जाता वो दूसरे ही दिन उनसे जा मिलता।हर मुलाक़ात में कभी-क छोड़कर वे हमें अक्सर  अपनी कवितायेँ सुनाते।बाकी तमाम बातों और सार स्वरुप टिप्पणियों के साथ वे हमेशा हमारे में मौजूद रहते हैं।उनकी कवितायेँ भी हमेशा अलग-अलग मूड की।आजकल तो गज़लें भी लिखने लगे हैं।आयोज्य आयोजनों के लिए हम सलाह मशवरे  उन्हीं से लेते।आज उनके घर एक अनौपचारिक संगोष्ठी है जिसमें कवितायेँ सूनी और पढ़ी जायेगी।श्रोता कम कवि ज्यादा शामिल होंगे।मुझे लगता है चित्तौड़ में लेखक कम कवि ज्यादा है।हालांकि कवि भी लेखक ही होते हैं।मगर सब जानते हैं कवि कुछ विशेष प्रकार के प्राणी होते हैं।पहली मर्तबा इस संगोष्ठी के लिए खुद रेणु दीदी और व्यास जी ने श्रोताओं और कवियों को चुन चुनकर बुलाया है।देखो कितने हलाल होते हैं।कितने पकाते हैं।कितने नयी कविता सुनाते हैं।कितने मंचो की कविता की तरह घिसीपिटी चपेक देते हैं।चित्तौड़ में सारे कवि हैं कवयित्री दीया लेकर ढूंढो तो नहीं मिलेगी।खैर मैं कहाँ था।हाँ डायरी की समाप्ति पर था।तो डायरी यहीं समाप्त होती है।

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