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27 नवंबर, 2013

27-11-2013

कुछ दिन से दिमाग केवल एक सीध में चल रहा है।बदलाव है तो सिर्फ यह कि पहले चर्चा में एक बाबाजी जी थे अब एक तरुण और एक तलवार भी आ गया है.चेहरे अदल-बदल रहे हैं मगर समाज का हत्यारा चेहरा बेहूदे ढंग से हमें चिढ़ा रहा है और हम अपने ढंग से प्रतिरोध करके ही चुप लगाएं बैठे हैं.भावानाओं के क़त्ल हो जाने के बाद और धर्म को बाजार की वस्तु बनाकर बेचने वाले हालातों में भी हम ढर्रे से अलग कुछ भी सोचना परम्परा के खिलाफ समझते हैं.भाड़ में जाए ऐसी परम्पराएँ जो हमें जड़ता की तरफ बढ़ा रही है.सामने दिखते मसलों पर हमें अपनी बनी-बनायी रायों को अब तब्दीलना होगा।बदलते हुए मानव मूल्यों में हमें भी एक पक्ष का निर्धारण करना होगा।चीजों को अपने हाल पर छोड़ते हुए हम खुद को दूर नहीं रख सकते हैं.

बीते दिनों कोई कविता नहीं बन सकी.(कविता बनाने से नहीं बनती इस बात से हम वाकिफ है जनाब मगर कभी कभी बहुत लंबा समय गुजर जाए तो यह बीच का खालीपन हमें रचने की ज़रूरत से प्रेरित करता है)कोशिशें की मगर कुछ भी नहीं बन सका.ऐसा भी मंजर आते हैं कि कविता जब आती है तो हम उसे कागज़ पर उत्तर नहीं पाते।फिर भी दोएक कवितायेँ लिखी है.कभी साझा करूंगा क्योंकि अभी उन्हें टाइप करने के प्रति दिमागी आलस का शिकार हूँ.

इधर चुनावी दायित्वों सम्बन्धी व्यस्तता हैं.हिंदी में एमए की पढ़ाई ने भी घेर रख्खा है.हिंदी की दो बड़ी पत्रिका में आलेख और चुनिंदा कवितायेँ आने वाली है.दिल में उत्साह है.इधर ससुराल से 'साले साहेब' आये हुए थे.तो व्यस्तता बेहद ज़रूरी थी ही.यह भी कहना चाहता हूँ आजकल मेरे अधिकाँश वक़्त मेंसे कुछ समय ntdv और ज़ी टीवी के प्राइम टाइम ले लेते हैं.रवीश कुमार ,अभिज्ञान प्रकाश और आजकल कादम्बिनी का फेन हूँ.कभी-क कलर्स चैनल का कपिल का नाइट कॉमेडी शो.कुछ समय फेसबुक के खाते रहता ही है.थोड़ा सा वक़्त बेटी अनुष्का के साथ मगजमारी में निकल जाता है.उसकी स्कूल डायरी की अंगरेजी लिखावट वाले आदेश/अनुगृह मुझे ही पढ़कर योजना बनानी पढ़ती है.ये अलग बात है कि येल्लो डे/स्वीट डे/ग्रीन डे के चोंचलों में मुझे अपना धूल-धूसरित बचपन भी याद आ जाता है.वही एकरंगी ड्रेस याद आ पड़ती है जिस पर पिताजी ठेगरे लगाने के चक्कर में रहते थे.अफ़सोस हम आज भी अंगरेजी माध्यम से शिक्षा लें या नहीं के भ्रम में उलझे हुए हैं.भ्रम भी एक लाइलाज़ बीमारी भाई,जितनी जल्दी हो बीमारी से बाहर निकल लो.बेहतर रहेगा।

अरे हाँ गिरस्ती के कुछ चयनित काम भी मेरे जिम्मे रहते हैं.आटा पिसाई/टांड से डिब्बे उतराई/सिलेन्डर की पहले माले पर चढ़ाई से लेकर दूध लाने,गर्म करके उसे चाय जैसे पेय में तब्दीलने तक.रिचार्ज डलवाने से लेकर नल/बिजली/फोन के बिल जमा करने तक.टैंक में नल की टोंटी खोलने,मोटर फिट करने से लेकर ऊपर का टैंक भरने तक का जिम्मा भी बन्दे के ही नामे ही है.हाथ बंटाना  अच्छा लगता है.बैंक और एटीएम के लिए भी मुझे ही दौड़ लगानी होती है.इन चयनित कामों के नाम पर हम अपने लिए अतिरिक्त वक़्त के टुकड़े भी कबाड़ ही लेते हैं जो कभी कभार तो ऑक्सीजन का कम कर जाते हैं,मैं जब यह सभी काम कर रहा होता हूँ तब अर्धांगिनी हमारी तरह किताबों में झुककर अपनी रूचि के हित फुरसत नहीं खरचती।

एक और ज़रूरी बात यह कि इधर-उधर के फुरसती कामों से आजकल निवृति सी ले रख्खी है.इधर हमउम्र लठैत दोस्तों के चेहरों पर चमक और बॉडी पर मस्त वाले कपड़े टंगे देखता हूँ तो दिल में शहर के शॉ रूम खुद दौड़े लगाने लग जाते हैं.यह भी सोचता हूँ कि नयी स्टाइल वाली कटिंग करवानी है, नए कपड़े सिलवाने हैं.बालों को कलर करना है.कभी कभी यह भी विचार आता है फिर से एक बार बड़ी दाढ़ी बढ़ाऊं।जींस-जब्बे-झोला और सेंडल टांग कर निकल पडूं उत्तराखंड।विचारों में उलझनें बनी हुयी है.कई मित्रों से मिले/बतियाये दिन हो गए हैं  रोजाना याद करते हैं बस अनलिमिटेड वाला फ्री रिचार्ज इस महीने नहीं हुआ सो कुछ बीएसएनएल-छाप मित्रों से खुले में बातें चपेकना मुश्किल ही रहा है.
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एक खुशफहमी के तहत खुद को अभी युवा होने की श्रेणी में ही शामिल अनुभव करता हूँ.जीवन में बड़ी विविधता है. अक्सर समय बच्चों के बीच गुजरता है.फुरसत के कई हिस्से अपने से बड़ों की संगत में ही बीते हैं.सभा मंडली भी ऐसी ही कबाड़ रख्खी है कि खुद को खुद के युवा होने पर शक हो जाए.खैर इन तमाम तरह की स्थितियों के बीच आज की युवा पीढ़ी पर कुछ भी बयानना तनिक मुश्किल किस्म का काम लग रहा है. मुझे कॉलेज के युवा मित्रों के बीच कुछ वक़्त रहना ही नहीं है बल्कि उन्ही के बारें में मुझे मेरा आँकलन परोसना भी है.लगता है यह वो पीढ़ी है जिसे उसके रहन-सहन स्तर के हिसाब से सभी को युवा होने के एक ही खांचे में रखकर कुछ भी एक सरीखा नहीं कहा जा सकता है.गांवों के युवाओं की हालत दयनीय और भ्रमित होने के ज्यादा करीब है.वे दुनिया को ठीक वैसी ही समझ बैठते हैं जैसी टीवी के डिब्बे में दिखती है.इधर शहर के युवा कुछ युवतर है/जानकार हैं/अपने लाभ-नुकसान से वाकिफ हैं मगर राष्ट्रीय मसलों से नावाकिफ लगते हैं.इस घोर बाज़ारू समय में युवा होना और जीवन को ठीक से आँकते हुए आगे बढ़ना बड़ा मुश्किल काम है.

पीढ़ियों के बीचे के गेप/अंतराल पर कहाँ से शुरू करें सोचने की ज़रूरत है.एक बारगी तो ये भी लगा कि कहीं से भी शुरू हो जाओ विषय पर तीर लग ही जाएगा।एक तरफ लगता है यह गेप हमेशा होता ही है.वक़्त के साथ दो पीढ़ियों के बीच के इस अंतराल को किस तरीके से आज का युवा या फिर बुजुर्ग वर्ग पाट सकता है इस पर विचार करने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं रहा।पूंजी केंद्रित जीवन शैली के इन सालों में ये जवान छोकरे-छोकरी अपने से उम्र मे बूढ़ों को गलतफहमीवश कुछ कम आँक कर चलते हैं.यह भी सच ही है कि युवा खुद को जिस तरीके से ओवरस्टिमेट करते हैं लगता है किसी उंडी खाई की तरफ ही बढ़ रहे हैं.एक तो इस दौर ने हमारी संवेदनशीलता को खुरच दिया है.हम दिल के बजाय दिमाग के उपयोग में ज्यादा व्यस्त हो गए हैं.

एक तरफ फेसबुकी और ट्विटर के शगल वाली स्मार्टफोनी पीढ़ी है और दूसरी तरफ लगभग अंधानुकरण वाली दकियानूसी पीढ़ी है.मगर एक तरफ अनुभवों से लबरेज हमारे बुजुर्ग साथी है और दूजी तरफ अनुभवी होने का खोखला दिखावा करते अपने नए-नवेले ज्ञान के बूते आगे बढ़ते युवा। अंतराल वाकई बड़ा है.ग्लोबलाजेशन के इस युग में हम अंगरेजी के व्यावसायिक उपयोग को नकार नहीं सकते जिससे केवल एक अदद नौकरी तो मिल ही सकती है.मगर हिंदी और अंगरेजी के बीच फँसा हमारा युवा निराशा के गर्त के ठीक पास खड़ा है.बिचारे माँ-बाप तो जितना हो सके करते ही हैं उन पर प्रश्न दागकर युवा केवल अपना गुस्सा जता रहे हैं जो एक सुविधाजनक रास्ता है.आज का युवा संवेदनाओं के स्तर पर बड़ा कमजोर है क्योंकि उसके मायनों में एक अच्छा संगीत/एक अच्छी संगत/एक चित्रकार के साथ बातचीत/एक कवि-लेखक के साथ एक शाम/कविता-कहानी के एक कताब-पत्रिका पढ़ना कोई मायने नहीं रखता है.व्यक्तिकेंद्रित होने के इस युग में हमें यह सोचना होगा कि स्वार्थ के अलग भी कोई दुनिया है.जिसमें अव्वल तो हमारा घर-परिवार और फिर  और फुरसत मिलें तो समाज और दश भी आ जाता है.

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