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24 जून, 2013

24-06-2013

अभी तक कुछ भी ढ़ंग से पढ़ नहीं पाया।सोचता हूँ वो 'सिरफिरे' ठीक ही कहते रहे।उनकी टिप्पणियाँ जो उस वक़्त कांटे-की सी चुभी आज बड़ी याद आती है।याद आने या उन मित्र सरीखे अमित्रों को मेरे वक़्त रहते संभल जाने का क्रेडिट देने का ये पहले-पहल मौक़ा नहीं है।अब अचानक आयी सुदबुद से कभी 'श्रीलाल शुक्ल' का 'राग दरबारी' पलटता हूँ। तो कभी 'विश्वनाथ त्रिपाठी' का 'हिन्दी साहित्य का सरल इतिहास'। हिन्दी में नेट होने की मशक्कत के चलते आंकड़ों में डूबा हुआ हूँ। एक-एक करके सारी अच्छी किताबें अपने टाइटल के साथ याद आ रही हैं। अभी तक पढ़ने की आदत से दूर मैं खुद में आलसी होने जैसी कुछ कमियों को जड़ी हुयी पा रहा हूँ।।ये नहीं कि मोतीचूर के लड्डू में ये कमियाँ दाख के माफिक जचे भी।कुछ भी नहीं पढ़ सका। पढ़ने योग्य सामग्री की लिस्ट बनाने से क्या फायदा। ऐसे समय में जब कम से कम मुझमें पढ़ने योग्य साहित्य छाँटने की बुद्धि तो आ ही गयी है जो अमूमन पाठकों में नदारद रहती है। किताबों की लिस्ट ओछी पड़ने के पूरे चांस हैं।मार्क्स पढूं या गांधी को।विवेकानंद को या राही मासूम रज़ा। सब बाकी है।कहीं से भी शुरू किया जा सकता है। प्रेमचंद के रंगभूमी-गोदान-सेवासदन से या फिर अज्ञेय के संपादित तार-सप्तक से।मैं फुरसत की पहली खेप में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल,  कबीर सहित थोड़ा सा मोहन राकेश और थोड़ा सा मन्नू भंडारी पढ़ना चाहता हूँ।

वो सबकुछ पढ़ना चाहता हूँ जो मुझे नास्तिक बने रहने की सहूलियत दे।वैज्ञानिक और यथार्थपरक सोच दे सके।जो गैर बराबरी का गणित ठीक से समझा सके।जो टोने-टोटके और हमारी संस्कृति में फर्क करना सीखा दे।जो धार्मिक हुए भी विवेकवान और एक परफोर्में रहते हुए भी लोकतांत्रिक होना सीखा दे। जो एक सफ़र में चलते रहें पर कट्टरपंथी होने बचा ले बस।जो 'राष्ट्रवादी' बनाने के साथ ही 'अतिराष्ट्रवादी' होने के ठप्पे से बचाके निकाल दे।जो आपसी सदभाव कायम करने के तमाम कायदे और निचोड़ स्वरुप व्याख्याएं सामने रख दे।

और भी बहुत पढ़ने की योजनाएं हैं जिनकी यथासमय याद दिलाने के लिए मैंने अपनी मित्रता उन लोगों से कर रख्खी है जो हिन्दी के कुछ हद जानकार है।मेरे लिए तो हिन्दी के समुद्र का रास्ता दिखाते प्रवेश द्वार समझ लो।हर रास्ते पर ऐसे ढ़ंग  के बटरोही मिल ही जाएँ पक्का नहीं।आपके तौर-तरीके और लख्खण पर भी डिपेंड करता है।  सारा मामला मेनेजमेंट का है गुरू ।काव्य शास्त्र पढ़ना हो तो राजेंद्र सिंघवी को पकड़ो, उपन्यास पर बात करनी हो तो राजेश चौधरी को शाम की चाय पर बुला लो।विचारों पर विवेचना रेणु  दीदी के घर संभव है।आलोचना पर टिप्पणियाँ सुनने  सत्यनारायण व्यास जी के घर से ज्यादा मुफीद जगह हो नहीं सकती है।कहानी और फुटकर चर्चाओं के बीच ठीक दिशा के लिए यथार्थवादी आदमी कनक जैन ठीक रहेगा। अपने अतीत पर खुलकर बोलने के लिए चेतन खमेसरा से मिलने में बुराई नहीं है। प्रकृति से मिलने का सलीका प्रकाश खत्री से पूछ लेने में मुझे कोई शर्म नहीं आती। मन बहलाने के लिए कुछ लंगोटिया दोस्त भी कबाड़ रख्खे हैं। उनके बगैर नयी पारी की बारबार शुरुआत कतई संभव नहीं है। यही है अपने शहर के परकोटे में जीने का अंदाज़।ज्यादा घुमड़के आ रहे हो तो चित्तौड़ के किले में एक-दो चक्कर मार आओ। दो-तीन पढ़ने लायक आर्टिकल के चक्कर में टेशन और रोडवेज वाली बुक स्टॉल से एक-दो पत्र-पत्रिकाएं खरीद मारो।
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डायरी में ये लिखना जायज रहेगा कि चाय पर बुलाये आदमी ने डायबिटीज के चलते चाय पी ही नहीं और एक मेजबान बनी हुई एकलौती चाय गुटक ही गया। एक चाय बनाने लिए भी बेचारी पतीली को उतना ही गर्मी  सहन करनी पड़ी। कटोरी रखी नमकीन से एक-दो फाकियां ही ली गयी और बेचारी कटोरी देखती ही रही।एक ट्रे एक ही कप के साथ लजाती हुयी टी-टेबल तक आयी।कम्यूटर की स्क्रीन देर तक इधर देखती रहीं मगर मेहमान ने उधर देखा तक नहीं।मुझे लगा इस देश और समाज में पतीली, कटोरी और ट्रे अरसे से यूंही उपेक्षित है।उन पर चर्चाएँ भी हुयी है मगर परिणाम सिफार ही रहा।उनके दुख्ख दर्द पर आंसू भी निकले मगर हालात जस-के-तस।
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फुरसत की दूसरी खेप में अपनी आदतों को ठेंगा दिखा बनारस पर बनी फिल्म 'रांजणा' देखना चाहूँगा। 'अम्बरसरिया' सरीखे गीत के कारण पूरी 'फुकरे' फिल्म देखनी ड्यू हो गयी है। किसी के रिकमंड करने पर गुलज़ार दादा की बनायी 'नमकीन' फिल्म भी जुगाड़ करके देखूंगा। बालों की तरफ देखता हूँ तो लगता है सबसे ज्यादा ज़रूरी काम तो इनमें मेहन्दी लगाना हो रहा है। कुछ नयी डिजाइनों के कपड़े सिलवाने की मन में आस भी पाल रखी है।खुलकर बरसात होने और पसंद के तालाबों के ठस्स भर जाते ही वहाँ दौड़े लगाने की योजनाएँ लिस्ट में लगभग ऊपर ही समझ लो।

योजना नहीं बना रख्खी है तो केवल इस बात की कि एक कविता लिखनी है।स्वार्थ  के चलते एक ऑफिसर से मिलने जाना है।एक दोस्त से कुछ लेने के चक्कर में हंसी-ठठ्ठा करना है।किसी की हाँ में हाँ मिलाने की कोई तयशुदा योजना नहीं बनायी है।अफसोस इस समाज में फिट सिद्ध होने की भी कोई दीगर योजना अभी तक तो नहीं ही बनायी है।

(नोट इस डायरी में शामिल सभी नामों के आगे 'श्री-श्री' या यथोचित सम्मानसूचक शब्द लगा हुआ माना जाए।)

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