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12 मई, 2017

जनहित में जारी

साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन और नांगल-मुंडन में एक बड़ा फ़र्क़ ये होता है कि एक में बाल मनुहार होती है दूजे में नहीं।एक में दर्शक का फायदा होता है एक में मेजबान का।हम श्रोता दर्शक कभी कभी गफलत में पड़ जाते हैं।साहित्यिक आयोजन में भी बाल मनुहार की बाट जोहने लग जाते हैं।थोड़ा सा सोचिएगा कि जिस वक्त आप अपने बच्चों को गार्डन घूमा रहे होते हैं,जिस वक्त आप आटा पिसाने गए होते हैं और जिस वक्त आप बिस्तर पर लेट टीवी भोग रहे होते हैं ठीक उसी वक़्त इसी सोसायटी का एक आदमी शहर के लिए अपने परिवार के हिस्से का वक़्त चुराकर एक आयोजन कर रहा होता है।याद रखिएगा उसके पास वापस परिवार में ही रमने का मौका हमेशा खुला है।शहर को संजीदा आयोजनों से जिंदा रखना है या इसे मुर्दा शांति वाले नगर में तब्दील करना है चॉइस आपकी है।

मेरे हाल के फेसबुक स्टेटस से घबराओ मत दोस्तों।मैं एकदम कुशल हूँ।यूँहीं अपने व्यंग्य की धार चेक कर रहा था।आपको याद होगा मैं पहले फेसबुक टिप्पणियों के लिए जाना जाता था।खैर छोड़ो।आत्ममुग्धता बड़ी घातक है।मैं भी बड़ा आत्ममुग्ध टाइप का आदमी हूँ।लोगों को पैसे देकर आयोजनों में अपनी तारीफ़ करवाता हूँ।कई बार तो तारीफ करवाने के लिए बाहर से मिलने वालों को अपने शहर तक बुला लेता हूँ।इमोशनल अपील जारी करके ऐसा रद्दी आयोजन करता हूँ कि शिरकत करने वाला श्रोता और दर्शक ठगा ही जाता है।ठगे जाने से बचना हो तो मेरी जानलेवा अपील के झांसे में नहीं आएं।

मैं एक दिन बहुत बड़ा गुरु बनूंगा और मेरे साथ वालों को मैं एक दिन अचानक अपने चेले बना दूंगा।एक बड़ा साम्राज्य स्थापित करूँगा।सभी को जी हजूरी सीखाना चाहता हूँ।मैं अपनेे साथ वालों को मेरे चरण स्पर्श को मजबूर करता हूँ।मेरी हां में हाँ नहीं मिलाने वाले मेरी आँख की किरकिरी बन जाते हैं।असल में मैं अपनों के साथ राजनीति खेलता हूँ।मुझसे बचे और अपना भविष्य सुरक्षित रखें।

मैं खुद तो पढ़ता नहीं हूँ और बाक़ी संगतकारों को किताबें पढ़ने,ले जाने और लौटाने के गणित में उलाझाए रखता हूँ।यही मेरी डिप्लोमेसी है।मुझे आता जाता कुछ नहीं बस इधर उधर से कुछ कुछ रट रखा है उसी से साथ वालों को चलाता हूँ।मेरे साथ मत चलिए।मैं एक दिन आपको डूबा दूंगा।मेरे साथ रहने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि मैं किसी को ऊपर नहीं उठने देता हूँ।किसी की तरक्की मुझे बर्दाश्त नहीं होती।मैं अपनी संगत से वो नकली दुनिया बनाता हूँ जो आपको यथार्थ से दूर ले जाती है।मैंने बीते पंद्रह साल में ऐसी नकली दुनिया खूब गूँथी है।इसमें उलझना मत। 

मैं इतना धाप कर आलसी हूँ कि खुद के काबिल सारे काम के मौके अपनी संगत वालों से करवा लेता हूँ।उनमें शेयर कर देता हूँ।कितना चालाक हूँ ना।बचिएगा मुझसे।मेरी संगत आपको बिगाड़ देगी।मैं सिर्फ ऐसे आयोजन करता हूँ जिससे किसी को फायदा नहीं होता सिर्फ आयोजक को सम्पूर्ण लाभ मिलता है।आप जितना मेरी किताबी ज़बान और जुगाली से बचेंगे उतना नफे में रहेंगे।मैं एक नाटकबाज और निहायती स्वार्थी आदमी हूँ मेरी संगत से बचिएगा।
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'पुस्तक साथी' 

आज विश्व पुस्तक दिवस है।इस मौके पर मैं आपको मेरा एक नवाचार साझा करना चाहता हूँ।नवाचार तो क्या बस एक पहल कह सकते हैं।अपने अध्यापन के दौरान मैंने पाया कि बच्चे सालभर अकादमिक किताबें पढ़कर अंकों के फेर में ही उलझे रहते हैं।वे ऐसा कुछ नहीं पढ़ पाते जिसके पढ़ने के बाद परीक्षा न देनी पड़े,जिसे पढ़ने के बाद बच्चे कुछ जुदा अनुभव करें।यह पुस्तकालय 'पुस्तक साथी' के नाम से संचालित होगा। यह संस्थागत अभियान नहीं होकर स्वप्रेरणा से किए गए गैर संस्थानिक प्रयास हैं.मैंने अपने एक होनहार नन्हें दोस्त धीरज को राजकमल प्रकाशन से मंगवाई 'प्रतिनिधि कहानियां' सीरीज के 22 कथाकारों की पुस्तकें सुपुर्द कर दी।गर्मियों की छूट्टियों में वो एक निःशुल्क समर लाइब्रेरी संचालित करेगा।रुचिशील पाठक उससे पुस्तकें ले दे और पढ़ सकेंगे।सबकुछ सलीके से और निःशुल्क।चारेक दिन ही हुए हैं।माहौल बनने लगा है।मुस्कान ने मोहन राकेश को चुना है।खुद धीरज मुंशी प्रेमचंद से शुरू कर सभी कहानियां खत्म करने वाला है।सुना है हर्षित और विशाखा भी क्रमश: गीतांजली श्री और मन्नू भंडारी का संकलन ले जा चुके हैं।गर्मियों की छुट्टियों में मैं इन बच्चों की संख्या 40 तक ले जाना चाहता हूँ।यह भी मन है कि प्रत्येक बच्चा कम से कम 50 कहानियां और 5 कथाकार से परिचय ले लें।किताबें फटने तक पढ़ी जाए तो पैसे वसूल है।सबसे ज़रूरी बात ये बच्चे अपनी प्रौढ़ अवस्था में ये नहीं कह सकेंगे कि हमें कोर्स के अलावा कुछ भी पढ़ने लिखने का कोई अवसर न मिला।
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सार्वजनिक पुस्तकालयों का हाल बड़ा बुरा है.किताबें एकदम पुराणी,नयी आती नहीं.आगे से जारी बहुत कम बजट का उपयोग भी चिकनी चुपड़ी पत्रिकाएँ खा जाती है.कुछ कमीशन-बाज प्रकाशन कचरा भेजते रहते हैं उन्हीं का इन्द्राज करते करते कर्मचारी की पेंशन हो जाती है.उपर से बचे हुए कार्मिकों की मानसकिता बड़ी दकियानूसी.बड़ी मुश्किल से आवेदन पत्र भरकर किसी अधिकारी की जमानत लिखवाई,लेकर गया तो बोले आज पुस्तकालय अध्यक्ष नहीं हैं.फिलहाल तो हम भौतिक सत्यापन में लगे हुए हैं.आप अप्रैल के अंत में आना.आए हुए सभी आवेदनों के लिए सभी के एक साथ सदस्यता कार्ड बनेंगे....पीने को ठंडा पानी नहीं.पर्याप्त लाइट नहीं.वाचनालय जैसी शान्ति नहीं............फिर मुझे याद आया असल में अब समाज में न पाठक रहे और न ही समाज के लिए एक सार्वजनिक पुस्तकालय कोई मुद्दा रहा......हद है......अरे कोई सुनता है एक चाय लाओ रे बढ़िया कड़क एकदम.
सन 2000 से अध्यापकी। 2002 से स्पिक मैके आन्दोलन में सक्रीय स्वयंसेवा। 2006 से 2017 तक ऑल इंडिया रेडियो,चित्तौड़गढ़ से अनौपचारिक जुड़ाव। 2009 में साहित्य और संस्कृति की ई-पत्रिका अपनी माटी की स्थापना। 2014 में 'चित्तौड़गढ़ फ़िल्म सोसायटी' की शुरुआत। 2014 में चित्तौड़गढ़ आर्ट फेस्टिवल की शुरुआत। चित्तौड़गढ़ में 'आरोहण' नामक समूह के मार्फ़त साहित्यिक-सामजिक गतिविधियों का आयोजन। कई राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सवों में प्रतिभागिता। अध्यापन के तौर पर हिंदी और इतिहास में स्नातकोत्तर। 'हिंदी दलित आत्मकथाओं में चित्रित सामाजिक मूल्य' विषय पर मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर से शोधरत। प्रकाशन: मधुमती, मंतव्यकृति ओर, परिकथा, वंचित जनता, कौशिकी, संवदीया, रेतपथ और उम्मीद पत्रिका सहित विधान केसरी जैसे पत्र  में कविताएँ प्रकाशित। कई आलेख छिटपुट जगह प्रकाशित।माणिकनामा के नाम से ब्लॉग लेखन। अब तक कोई किताब नहीं। सम्पर्क-चित्तौड़गढ़-312001, राजस्थान। मो-09460711896, ई-मेल manik@apnimaati.com

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