Loading...
27 नवंबर, 2017

क्या भूलूँ क्या याद करूँ.....(उदयपुर फ़िल्म सोसायटी की यात्रा और मेरे अनुभव)


क्या भूलूँ क्या याद करूँ.....
(उदयपुर फ़िल्म सोसायटी की यात्रा और मेरे अनुभव)

जब चारेक साल पीछे मुड़कर देखता और खासकर सोचता हुआ देखता हूँ तो पाता हूँ कि सिनेमा को लेकर ठीकठाक समझ बनाने में मेरी सबसे ज्यादा मदद अगर किसी ने की है तो 'प्रतिरोध के सिनेमा' ने की है। अब तक मुख्यधारा का एकरसता पैदा करता हुआ व्यावसायिक सिनेमा ही हमारे केंद्र में था। जब इस सिनेमा केन्द्रित अभियान और बल्कि कहना चाहिए आन्दोलन की चपेट में हम भी आए तो सबसे अव्वल इसके राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी से मेल-मिलाप हुआ। यह समय साल दो हज़ार तेरह का रहा होगा जब हमारे वरिष्ठ साथी लक्ष्मण जी व्यास ने संजय भाई का एक लंबा इंटरव्यू किया था। तब बातचीत के दौरान बीस मिनट तक रिकॉर्डर का माइक मैंने ही थामकर रखा था। वो पल इस प्रतिबद्धताभरे आन्दोलन में मेरे दाख़िले के पल थे। बाद के समय में हिमांशु भैया और प्रग्न्या भाभी से परिचय हुआ जो कमोबेश कुछ प्रगाढ़ ही हुआ। इन नए रिश्तों में मैंने जो सहजता और सादगी महसूसी वह अद्भुत और प्रेरक थी। बात आगे लिखूं तो कहना चाहता हूँ कि उदयपुर फ़िल्म सोसायटी के तमाम युवा और युवतर साथियों की सामूहिकता बढ़ी खुशी-प्रदायक अनुभव हुई। हालाँकि मैं स्पिक मैके जैसे सांस्कृतिक आन्दोलन में युवाओं के साथ संगत और सक्रियता का एक दशक गुज़ार चुका था मगर फिर भी इस टोली के साथ हिमांशु भैया और प्रज्ञा भाभी के निर्देशन और संयोजन का कायल हो गया था। यहाँ कि खुशबू कुछ भिन्न किस्म की थी। 'प्रज्ञा' शब्द यह जानते हुए भी लिखा कि यह एकदम ग़लत है क्योंकि यही शब्द हमारी ज़बान पर चढ़ा हुआ है जो अब आमफ़हम भी है। समानान्तर, प्रतिरोध, वैकल्पिक जैसी संज्ञाएँ और ऐसी परिभाषाओं से लबरेज सिनेमा की समझ क्या होती है और यों कहें इसका ककहरा इसी सोसायटी के शुरुआती फेस्टिवल में सिखा और आगे प्रचारित किया था। यही वो सोसायटी है जिसने हमें शैलेन्द्र सिंह भाटी और धर्मराज जोशी जैसे मित्र दिए। सुधा चौधरी जी जैसी सक्रीय सामाजिक कार्यकर्ता और प्रोफ़ेसर से मिलाया

उदयपुर में अब तक हो चुके चार फ़िल्म फेस्टिवल में मैं लगभग हर बार हिस्सेदारी करने गया ही था। एक अजीब आकर्षण हमेशा मौजूद रहा कि मैं येनकेन प्रकारेण उदयपुर चला ही गया। बाद के वर्षों में इन्हीं लोगों से फीचर और डॉक्युमेंट्री फ़िल्मों का एक बड़ा आर्काइव भी एकत्रित किया। उदयपुर जाने में मैं कभी अकेला और कभी दुकेला था। और हाँ कभी-कभी अपनी हमविचार टोली के साथ भी। यही वो सिनेमा यात्रा थी जिसके प्रभाव में आने के बाद हमने एक साल चित्तौड़गढ़ में भी एक दिवसीय आयोजन भी रखा। एक ही दिन में तीन आयोजन। लगभग सार्थक दिन था वो। जैसे-तैसे चित्तौड़गढ़ फ़िल्म सोसायटी का गठन भी हुआ और मामला आगे बढ़ा। इन सभी हौसलों के पीछे कहीं न कहीं उदयपुर के साथियों के काम का ताप था। उदयपुर के साथी जिस तल्लीनता से काम करते देखे गए वे मुझे क्या किसी भी बहुधन्धी को प्रेरित कर उसमें जोश पैदा कर सकते हैं। बाद के सालों में हमने शहर में फेसबुक और ब्लॉग आदि आभासी माध्यमों का उपयोग करते हुए इस आन्दोलन को आगे ही बढ़ाया। काम करने की स्टाइल और विचार का स्रोत कम या ज्यादा कहें उदयपुर के इर्दगिर्द ही रहा। यह उदयपुर टीम ज़मीन के साथ ही अब फेसबुक और ब्लॉग के माध्यम से भी बहुत दूर तक अपने सन्देश पहुँचा पा रही है हमें इस बात की बड़ी खुशी है। बहुत बाद में लगा उदयपुर जैसे लोकप्रिय शहर को इस जन सरोकार टोली ने इस सिनेमा केन्द्रित ज़रूरी आयोजन के बहाने बहुत बड़ा उपहार दिया है। कभी भूल नहीं पाएंगे कि यहीं हमने देश के प्रतिबद्ध फ़िल्मकार आनंद पटवर्धन को सुना और अभिप्रेरित हुए हैं। सूर्य शंकर दाश, बेला नेगी हो या फिर कोई और। सभी के अभियानों से परिचय इसी आन्दोलन ने कराया है। इस सोसायटी की कई और खासियतें हैं जैसे पोस्टर प्रदर्शनी, मंथली फ़िल्म स्क्रीनिंग, फ़िल्म क्लब निर्माण। वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर इन युवाओं के बीच चिंतन और वाद-विवाद के कई सिलसिलों का साक्षी भी हूँ क्यों कि कुछ समय मुझे इनके वाट्स एप ग्रुप में भी रहने का मौक़ा मिला। असल में यह सिनेमा यात्रा एकदम जुदा किस्म के सफ़र पर ले जाती है

'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' जैसे शीर्षक के लिए हरिवंश राय बच्चन से माफी मांगते हुए कहना चाहता हूँ कि इस सोसायटी के साथ हमारा एक अपनापा सा हो गया है। जहां भूलने लायक कुछ है नहीं सबकुछ यादों में सहेजने का मन करता है फिर भी कुछ तो याददाश्त की कमज़ोरी लील ही जाती है। हमें संजय काक और नकुल सिंह सहाने जैसे हस्तक्षेप करने वाले लोगों के काम से रू-ब-रू कराने का जिम्मा इसी सोसायटी ने निभाया था। यहीं कुछ अलग किस्म कि किताबों के मेले से एकमेक करवाया। यहीं से संवाद की संस्कृति की झलक भीतर तक अनुभव कर पाए। यहीं आकर जाना कि तमाम दौड़ाभागी के बीच भी अगर मन हो तो किन्हीं तीन दिन को सार्थक तीन दिन में तब्दील किया जा सकता है। इसी सोसायटी की मेहनत थी जिसने हमें भरोसा दिया और हम चित्तौड़गढ़ के साथ ही भीलवाड़ा और अजमेर तक के साथियों को फेस्टिवल में खींच लाए। बलराज साहनी की 'गरम हवा' और  हनीफ भाई की 'कैद' जैसी फ़िल्में हमारे दिल में समा पाई इसका क्रेडिट उदयपुर के इन्हीं साथियों को जाता है। हाँ एक बात तो लिखने से चूक ही जाता कि हमने जनगीतों की समझ यहीं से ली और उसे आगे बढ़ाते हुए अपने शहर में एक शाम जन गीतों के नाम भी रखी। उदयपुर के साथियों का चित्तौड़ आकर गाया गया शैलेन्द्र का वो गीत आज भी याद है जिसके बोल थे 'तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत में यकीन कर'


इन बीते चारेक सालों के सभी फेस्टिवल में इस सोसायटी ने लगातार खुद को साबित किया है और आई हुई मुश्किलों का हिम्मत से सामना किया है। इसकी एक और खूबसूरती यह भी रही कि इसमें संयोजक पद पर हर वर्ष बिना किसी हो-हल्ले के नए साथी को मनोनीत करके आन्दोलन को आगे बढ़ाया जाता है और लोकतांत्रिकता ज़िंदा रखा जाता है। जानता हूँ यह बहुत छोटी और तुरत-फुरत में लिखी एक टिप्पणी है मगर फिर भी आखिर में यही कहना नहीं भूलूंगा कि यह आन्दोलन हम सभी की जान है। हम चित्तौड़गढ़ जैसे छोटे शहर इअसे आयोजन नहीं कर पाते हैं मगर अपने कुछ साथी उदयपुर के आयोजन में शामिल होकर थोड़ी सी तसल्ली अपने खाते में मांड ही लेते हैं। पांचवें फेस्टिवल में आने के लिए मन बना लिए गए हैं। आयोजनों की थीम सदैव जनसरोकार से जुड़ी रहती है इस बार भी थीम केन्द्रित इस अवसर को बहुत सारी शुभकामनाएं। सफ़र जारी रहे और हाथ से हाथ जुड़ते रहें। हमसे जितना बन सकेगा सपोर्ट करेंगे ही। गैरबराबरी मुक्त समाज के सपने के लिए आप सभी आगे बढ़े और अपने मुद्दों पर कायम रहें। भारतीय संविधान से मिले अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना हम सभी कि जिम्मेदारी है। यह सामूहिकता जिंदाबाद है और आगे भी जिंदाबाद रहेगी। बेहतर कल के लिए हम साथ हैं 


माणिक उर्फ़ 'बसेड़ा वाले हिंदी के माड़साब'। 

सन 2000 से अध्यापकी। 2002 से स्पिक मैके आन्दोलन में सक्रीय स्वयंसेवा।2006 से 2017 तक ऑल इंडिया रेडियो,चित्तौड़गढ़ से अनौपचारिक जुड़ाव। 2009 में साहित्य और संस्कृति की ई-पत्रिका अपनी माटी की स्थापना। 2014 में 'चित्तौड़गढ़ फ़िल्म सोसायटी' की शुरुआत। 2014 में चित्तौड़गढ़ आर्ट फेस्टिवल की शुरुआत। चित्तौड़गढ़ में 'आरोहण' नामक समूह के मार्फ़त साहित्यिक-सामजिक गतिविधियों का आयोजनकई राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सवों में प्रतिभागिता। अध्यापन के तौर पर हिंदी और इतिहास में स्नातकोत्तर। 'हिंदी दलित आत्मकथाओं में चित्रित सामाजिक मूल्य' विषय पर मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर से शोधरत

प्रकाशन: मधुमतीमंतव्यकृति ओर, परिकथा, वंचित जनता, कौशिकी, संवदीया, रेतपथ और उम्मीद पत्रिका सहित विधान केसरी जैसे पत्र  में कविताएँ प्रकाशित। कई आलेख छिटपुट जगह प्रकाशित।माणिकनामा के नाम से ब्लॉग लेखन। अब तक कोई किताब नहीं। सम्पर्क-चित्तौड़गढ़-312001, राजस्थान। मो-09460711896, ई-मेल manik@spicmacay.com

0 comments:

टिप्पणी पोस्ट करें

 
TOP