खस्ताहाल महल देख तुम चकित न होना पलभर सारी यादें ताज़ा करते यहीं ठिकाने भामाशाह के आँख फाड़ फाड़ क्या हो देखते जो बिखरा है वही सचाई न...
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03 नवंबर, 2010
31 अक्टूबर, 2010
किले में कविता:'कौन खबर ले किले की'
अतिथि को दिखाने के काम आता था किला हमारे शहर का विचार नकली था मगर बरसों बना रहा अटल पुरखों से हमारे घर में कभी कभार बन ...
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