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03 नवंबर, 2010

किले में कविता:'मैं अवेरता हूँ पत्थर'




खस्ताहाल महल देख तुम 
चकित न होना पलभर 
सारी यादें ताज़ा करते  
यहीं ठिकाने भामाशाह के
आँख फाड़ फाड़ क्या हो देखते
जो बिखरा है वही सचाई
नहीं भ्रम ये भारी
अरसे से लिखा है
यही है फितरत इनकी   
कुछ टेड़े मेड़े पत्थर ही 
इतिहास हुआ करते हैं
मेरी तेरी राह अलग है
मीरा ढूंढो तुम यहाँ किले में
मैं अवेरता हूँ पत्थर तबतक 
अथक प्रयास हो हमारा
यत्न सतत हो अपना 
जब तक तुम पन्ना ढूँढते
मैं सूचि बनाऊँ विखंडन की
तुम दिमाग लगाओ अपना
 मैं दिल की सुन लूं कुछ देर
उपर उपर तुम देखो
अन्दर तक झाँक लूं मैं ज़रा
तेरी आँखे सीताफल देखती है
किले में मुझको क्यों दिखती
बिखरे जंगल की टूटी बाड़
शायद फरक हमेशा यूंही रहेगा 
यही नियत है यही है होना
युवा आँखे को साफ़ दिखता है
अब बढ़ाती आँखे धुंधलाती है
तुम चलो खरगोशचाल 
मैं कछुआ कछुआ आता हूँ 
आते जाते सभी धोकते
मीरा-कुम्भ-श्याम-कालिका
धोक लो तुम भी कुछ और देवरे 
रहे न बाकी कसर आज 
थोड़ी झाड़पोंछ मैं भी कर लूं 
 निपटा दूं एकाध महल आज 
शक न करना मुझ पर भाई
बरसों से बना हूँ मैं ऐसा ही
तुम अब जन्मे हो नए साल में 
 मैं बरसों की पैदा हूँ
किला तुम्हे पिकनिक दिखता होगा
मुझको दिखता बिता हुआ वक्त
चलो मना लो पिकनिक तुम 
कुछ देर मैं सिलूँ चिथड़े वक्त के 

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