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28 जुलाई, 2014

'यात्रा' पत्रिका के आठवें अंक में दो कवितायेँ


हदें पार करना नहीं आता उन्हें

हदें पार करना नहीं आता उन्हें
तुम्हारी तरह
लूटने-खसोटने सहित
बदन नोचना उन्हें नहीं आता

जितना जिया जीवन उन्होंने
सीमाओं के भीतर ही जिया
घटित हुए  उनके सारे संस्कार
सीमाओं के भीतर

वे जब भी खुलकर खिलखिलाए
उनकी अपनी बोली में उपजे ठहाको के आसपास
टहलते दिखे

बतियाए बेहिचक जब भी
वे मिले बीड़ी-तम्बाकू पीते
हमजात बिरादरी के बीच
किसी चबूतरे या घने पेड़ के नीचे
सधी हुई गोलाकार सभा में
उन्हीं की बातों पर हुंकारे भरते सुने गए

दूर-दूर तक
उल्लासभरे उनके चेहरों पर
नहीं था मौत का डर
वे महफूज ही थे
तुम्हारी घुसपेठ से ठीक पहले तक
राजीखुशी थे वे सभी
जंगलों,गुफाओं और पहाड़ों में
अब तक

लकीरें खींच गयी हैं उनके माथों पर
कुछ सालों से
हाथों में आ गए हैं उनके अनायास
तीर-कमान और देसी कट्टे
अपने बचाव में
तन गए हैं वे सभी

वे ज़रूर बचाएँगे
अपनी आज़ाद दुनिया को
बेवज़ह कुतरे जाने से
लुटने और छिन जाने से
जैसे हर गरीब रखता है बचाकर
अपनी इज्ज़र-आबरू
येनकेन
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त्रासदी के बाद

आँगन बीच इस बार भी
बहिन लेकर बैठी है थाली में
कुमकुम,जलभरा लौटा
सलवटों वाले पचास के नोट के साथ दो राखियाँ
एक नारियल, चुटकीभर नमक, चावल
और थोड़ा सा मीठा
सबकुछ सालाना आदत के मुताबिक़

आँगन रीता है तो सिर्फ भाई के चले जाने से
त्रासदी के बाद

हजारों भाइयों के बगैर हजारों बहिनें और
कई-कई हजार कलाइयां
रही बगैर राखियों के
इस बार उदास दिखीं
मुहल्ले की तमाम गलियाँ
त्रासदी के बाद

आँगन की उल्ली तरफ वाली भींत के सहारे
पीठ टिकाए
कई दर्जन आँखें बिलखती रहीं
देर तक सोये नहीं लोग बीती राखी की याद में

बीते राखी जहां घर के बच्चे
बदारे हुए नारियल की चटकें दाँतों से चगरते रहे
पूरे समय फुदकती दिखीं
झूलों के आसपास लड़कियां
गले में लटकाए चटकों की मालाएं
सावण गाती रहीं देर तक
बीती राखी

कई  हाथों में इस बार
होक वाली चांदी या भोडर की राखियाँ
बंधी दिखी तो गला भर आया

उधर पहाड़ों में रुँधे गले से रोए
बहुत से जवान, घराती और बच्चे
इकलौते अंगोछे से पौंछकर आँसू बारी-बारी
लौटे जो नहीं है घरों को
महीनों से गायब
उनके अस्सी पार आदमी और साठ या सत्तर की कई औरतें
त्रासदी के बाद

कई खच्चरों के मालिकों सहित
कई गांवों के कई घरों में
एक भी नहीं बचा तीमारदारी के लिए
सबकुछ बंजर की श्रेणी में शामिल होता हुआ
हाँ हाँ सबकुछ
सबकुछ का मतलब यहाँ सबकुछ ही है

बची हुईं हैं तो सिर्फ
कुछ अधूरी सूचियाँ
जो चस्पा है अपनी बेहयाई के साथ
सरकारी नोटिस बोर्ड की दिवार पर
जिनकी नीली स्याही पर गढ़ी हैं कई अपलक आँखें
सर मुंडाएं लोगों की
त्रासदी के बाद

इस पहले तेंवार भी बैठने आए थे
गाँव-गुवाड़ी के मोतबीर लोग आदतवश
पूछ कर कुशलक्षेम पाव-अध् घड़ी बतियाए भी
तिरपाल की सलवटों पर हाथ फेरते
उन्होंने बीड़ी पी-तम्बाकू रगड़ी
दे गए दिलासे कई सारे
माचिस की तिली से कान साफ़ करने के अंदाज में
त्रासदी के बाद

अफ़सोस कुछ घरों में
सब के सब चल बसे
न रोने वाली बची है औरतें पीछे
न बचा है तिरपाल बिछाकर बैठने वाला  कोई

त्रासदी के बाद


माणिक 
(सन 2000 से अध्यापकी।स्पिक मैके आन्दोलन में बारह वर्षों की सक्रीय स्वयंसेवा। साहित्य और संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका अपनी माटी की स्थापना। कई राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सवों में प्रतिभागिता। ऑल इंडिया रेडियो से अनौपचारिक जुड़ाव। अब तक यात्रा,मधुमतीकृति ओर परिकथा, वंचित जनता, कौशिकी, संवदीया  और पत्रिका सहित विधान केसरी  जैसे पत्र  में कविताएँ प्रकाशित। कई आलेख छिटपुट जगह प्रकाशित। माणिकनामा के नाम से ब्लॉग और माणिक की डायरी  का लेखन। अब तक कोई किताब नहीं, कोई बड़ा सम्मान नहीं। सम्पर्क-चित्तौड़गढ़-312001, राजस्थान। मो-09460711896, ई-मेल manik@apnimaati.com  )

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